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हिन्दू शास्त्रों के अनुसार क्यों नहीं होती एक गोत्र में शादी…. !

गौत्र शब्द से अभिप्राय कुल व वंश से है, वास्तव में गौत्र प्रणाली का जो मुख्य उद्देश्य है वह उसको मूल प्राचीनतम व्यक्ति से जोड़ता है. जैसे की एक व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है तो इसका अभिप्राय यह है की उसके पुराने पूर्वज वैदिक ऋषि भारद्वाज से संबंधित थे या यह कह लीजिए की उसका जन्म भारद्वाज पीढ़ी में हुआ था.

आपने एक ही गौत्र में शादी से जुड़ी कोंट्रोवर्सीस के बारे में तो आपने सुना ही होगा. अखबारों में आये दिन कहीं ना कहीं से खबर मिलती है की किसी जोडे की इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकी उन्होने घरवालों की इच्छा के खिलाफ, एक ही गौत्र में शादी करी. खप पंचायत ने तो एक ही गौत्र में विवाह को गैर कानूनी करार दे दिया है.

आइये जानते है इस पुरे विवाद के बारे मैं पुराणों में क्या लिखा है,

विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्ति की संतान ‘गौत्र’ कहलाती है. ब्राह्मणों के विवाह में गौत्र-प्रवर का बड़ा महत्व है. पुराणों व स्मृति ग्रंथों में बताया गया है कि यदि कोई कन्या संगौत्र हो, किंतु सप्रवर न हो अथवा सप्रवर हो किंतु संगौत्र न हो, तो ऐसी कन्या के विवाह को अनुमति नहीं दी जाना चाहिए.

यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भारद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है. आगे चलकर गौत्र का संबंध धार्मिक परंपरा से जुड़ गया और विवाह करते समय इसका उपयोग किया जाने लगा.

ऋषियों की संख्या लाख-करोड़ होने के कारण गौत्रों की संख्या भी लाख-करोड़ मानी जाती है, परंतु सामान्यतः आठ ऋषियों के नाम पर मूल आठ गौत्र ऋषि माने जाते हैं, जिनके वंश के पुरुषों के नाम पर अन्य गौत्र बनाए गए. ‘महाभारत’ के शांतिपर्व (297/17-18) में मूल चार गौत्र बताए गए हैं.

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