जब दुर्योधन ने चली एक ऐसी चाल, जिससे पांडव भी हो गये थे चारो खाने चित्त !

जब महाभारत युद्ध आरम्भ हो रहा था तब कौरव और पांडवो दोनों ने अपने अपने दूत इधर उधर के राजाओ के पास सहायता के लिए भेजी. मद्रराज शल्य को भी जब इस सुचना मिली तो वे अपने पुत्रो एवम अक्षोहणी सेना के साथ पांडवो के पास चले.

शल्य की बहन माद्री पाण्डु की पत्नी थी इसी कारण नकुल एवम सहदेव उनके सगे भांजे थे. पांडवों को विश्वास था कि शल्य उनके पक्ष में ही रहेंगे.

शल्य की विशाल सेना दो-दो कोस पर पड़ाव डालती चल रही थीं. दुर्योधन को समाचार पहले ही मिल गया था. उसने मार्ग में जहां-जहां सेना के पड़ाव के उपयुक्त स्थानों पर कारीगर भेजकर सभा-भवन एवं निवास स्थान बनवा दिए.हर पड़ाव पर बेहतर भोजनादि की व्यवस्था करवा दी गई थी.

मद्रराज शल्य और उनकी सेना का मार्ग में सभी पड़ावों पर भरपूर स्वागत हुआ. शल्य यही समझते थे कि यह सब व्यवस्था युधिष्ठिर ने की है.

हस्तिनापुर के पास पहुंचने पर विश्राम स्थलों उसे देखकर शल्य ने पूछा-‘युधिष्ठिर के किन कर्मचारियों ने यह व्यवस्था की है? उन्हें ले आओ. मैं उन्हें पुरस्कार देना चाहता हूं.’

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