भगवान् श्रीकृष्ण जी ने क्यों पिया राधा रानी जी के पैरो का चरणामृत

हम भगवान् के मंदिर का चरणामृत पीते है जिसमे पंचतत्व -दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल से भगवान् को स्नान कराया जाता है जिसको पीने से कष्टो से मुक्ति मिलती है. इससे सम्बंधित पौराणिक गाथा भी प्रसिद्ध है और वो भी राधा रानी और कृष्ण जी के अटूट प्रेम की.

कहा जाता है की एक बार जब श्री कृष्ण जी बहुत बीमार हो गए थे तब कोई भी जड़ीबूटी या दवा इन पर कुछ भी असरदार साबित नही हुई थी तभी श्रीकृष्ण ने स्वयं ही गोपियों से एक उपाय करने के लिए कहा जिसको सुन सभी गोपियां दुविधा में पड़ गईं।

वो उपाय चरणामृत पिलाने का था. उपाय के अनुसार उनकी परम भक्त या फिर जो भी उनसे अधिक प्रेम करता है तथा उनकी चिंता करता है यदि उसके पांव को धोने के लिए इस्तेमाल हुए जल को वे ग्रहण कर लें तो वे निश्चित ही ठीक हो जाएंगे।

लेकिन दूसरी ओर गोपियां और भी चिंता में पड़ गईं। श्रीकृष्ण उन सभी गोपियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे, वे सभी उनकी परम भक्त थीं लेकिन उन्हें इस उपाय के असफल होने की चिंता सता रही थी।

उनके मन में बार-बार यह आ रहा था कि यदि उनमें से किसी एक गोपी ने अपने पांव के धोनें में इस्तेमाल हुए जल से चरणामृत बना भी लिया और कृष्णजी को पीने के लिए दिया तो वह श्री कृष्ण जी के प्रति अपनी भक्ति और प्रेम तो दर्शा देंगी परन्तु किन्हीं कारणों से कान्हा ठीक ना हुए तो उसे नर्क भोगना पड़ेगा।

अब सभी गोपियां व्याकुल होकर श्रीकृष्ण की ओर ताक रहीं थी और किसी अन्य उपाय के बारे में सोच ही रहीं थी कि वहां कृष्ण की प्रिय राधा आ गईं। अपने कृष्ण को इस हालत में देख के ऐसा प्रतीत हो रहा था की मानो राधा जी के प्राण पखेरू ही उड़ गए हो |

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