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1 oct-pratham navratri

शैलपुत्री

नवरात्र के पहले दिन मां के जिस रूप की उपासना की जाती है, उसे शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण मां दुर्गा के इस रूप का नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा था।शास्‍त्रों के अनुसार माता शैलपुत्री का स्वरुप अति दिव्य है। मां के दाहिने हाथ में भगवान शिव द्वारा दिया गया त्रिशूल है जबकि मां के बाएं हाथ में भगवान विष्‍णु द्वारा प्रदत्‍त कमल का फूल सुशोभित है। मां शैलपुत्री बैल पर सवारी करती हैं और इन्‍हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं का रक्षक माना जाता है।

नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के शैलपुत्री वाले रूप की आराधना करने से आकस्मिक आपदाओं से मुक्ति मिलती है। इसीलिए दुर्गम स्थानों पर बस्तियां बनाने से पहले मां शैलपुत्री की स्थापना की जाती है माना जाता है कि इनकी स्थापना से वह स्थान सुरक्षित हो जाता है और मां की प्रतिमा स्थापित होने के बाद उस स्थान पर आपदा, रोग, व्‍याधि, संक्रमण का खतरा नहीं होता तथा जीव निश्चिंत होकर उस स्‍थान पर अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार मां शैलपुत्री अपने पूर्वजन्म में दक्ष-प्रजापति की पुत्री सती थीं, जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ था।

धार्मिक मान्‍यतानुसार मां दुर्गा के इस शैलपुत्री के रूप की उपासना करते समय निम्‍न मंत्र का उच्‍चारण करने से मां जल्‍दी प्रसन्‍न होती हैं, तथा वांछित फल प्रदान करने में सहायता करती हैं-

वन्देवांछितलाभायचंद्राद्र्धकृतशेखराम। वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम।।

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