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क्यों कलाकार दुर्गाप्रतिमा बनाने से पहले एक मुट्ठी वेश्या के आंगन की मिट्टी मिलाता है …

नवरात्र चाहे जितने भी पवित्र तरीके से क्यों न मनाए जाते हों, लेकिन इस अवसर पर देवी की मूर्तियां बनाने में जिस खास तरह की मिट्टी का इस्तेमाल होता है, वह मिट्टी सोनागाछी से आती है। सोनागाछी कोलकाता का रेडलाइट इलाका है।

दुर्गा मां ने अपनी भक्त वेश्या को उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर एक वरदान दिया था कि तुम्हारे हाथ से दी हुई गंगा की चिकनी मिट्टी से ही प्रतिमा बनेगी। उन्होंने उस भक्त को सामाजिक तिरस्कार से बचाने के लिए ऐसा किया। तभी से सोनागाछी की मिट्टी से देवी की प्रतिमा बनाने की परम्परा शुरू हो गई।

महालया के दिन ही दुर्गा मां की अधूरी गढ़ी प्रतिमा पर आंखें बनाई जाती हैं, जिसे चक्षु-दान कहते हैं। इस दिन लोग अपने मृत संबंधियों को तर्पण अर्पित करते हैं और उसके बाद ही शुरू हो जाता है देवी पक्ष। दुर्गा अपने पति शिव को कैलाश में ही छोड़ गणेेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ दस दिनों के लिए अपने पीहर आती है।

इन प्रतिमाओं को बनाने के लिए पहले लकड़ी के ढांचे पर जूट आदि बांध कर ढांचा तैयार करते हैं और उसके बाद मिट्टी के साथ धान के छिलके मिलाकर मूर्ति तैयार की जाती है। फिर प्रतिमा की साज-सज्जा की जाती है, जिसमें नाना प्रकार के गहने और वस्त्र उपयोग में लाए जाते हैं।

केवल दुर्गा की प्रतिमा को ही नहीं, बल्कि पांडालों को भी बहुत सुंदर तरह से बनाया जाता हैं। कोलकाता में बांस और कपड़े से अमृतसर का स्वर्ण मंदिर, पेरिस के एफिल टावर जैसा दुर्गा पांडाल बनाया जाता है। पंडालों की रोशनी से सारा शहर दुल्हन जैसा लगता है।

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