दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष ( ) धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं जाते। वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।

एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं जिससे देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं जिसकी वजह से इनका नाम गौरी पड़ा।

मां महागौरी की उत्‍पत्ति के संदर्भ में एक और कथा है जिसके अनुसार एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ जाती है परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ जाता है। इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो जाता है। देवी जब तप से उठती हैंख्‍ तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपनी सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से मां के समान ही उसने भी तपस्या की हाेती है। इसीलिए देवी गौरी का वाहन बैल भी है और सिंह भी।

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