हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें,

इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं जिसमे हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं।

शास्त्रों के अनुसार पितरों के लिए किया गया श्राद्ध आपके परिवार के उन्हें तृप्त करता है, जो पितृलोक में हैं। श्राद्ध के माध्यम से दी गई वस्तु पितरों तक पहुंचती है और वे श्राद्ध करने वाले को आशीर्वाद देते हैं।

अधिकतर लोग श्राद्ध पक्ष में नए काम करने से बचते हैं, लेकिन जिन लोगों पर पितरों की कृपा होती है, उन्हें नए काम करने से लाभ होता है। आइए, जानते हैं उन संकेतों के बारे में जो बताते हैं कि आप पर पितरों का अशीर्वाद है और श्राद्ध पक्ष में कोई भी नया काम करने पर आपकी किस्मत चमक सकती है…

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मान्यता है कि सच्चे मन, धन और श्रद्धा से किया गया पितृ कर्म वंश को खुशहाली देता है। इस बार चतुर्दशी एवं अमावस्या का श्राद्ध 19 सितंबर को किया जाएगा। 20 सितंबर को स्नान, दान एवं पितृ विसर्जन गंगा घाटों पर किया जाएगा।

इन दिनों घर में प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा, दातून, पान, तेल मालिश, गंदगी और शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। आचार्य अमरेश मिश्रा ने बताया कि छह सितंबर को दोपहर 12:30 बजे के बाद से प्रतिपदा का श्राद्ध किया जाएगा।

14 सितंबर को मातृ नवमी का श्राद्ध होगा। उन्होंने बताया कि ब्रह्म पुराण में पितृ पक्ष पूर्वजों के दिन माने गए हैं। हर रोज सूर्योदय के बाद दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके जल में काले तिल, लाल-सफेद फूल और कुश डाल कर पितरों को जल दें। उंगली में पवित्री पहनें। प्रतिदिन कुत्ते, गाय और कौओं को भोजन जरूर दें।

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