सोमवती अमावस्या: ये उपाय दूर करेंगे गरीबी और जीवन की हर परेशानी

सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। यह वर्ष में एक बार ही आती है। इस बार 15 अप्रैल को सुबह 8:37 बजे से 16 अप्रैल को 07:27 बजे तक अमावस्या है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजन करने से श्री हरि की कृपा बरसती है।
सोमवार के दिन आने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। यह अमावस्या साल में लगभग एक ही बार आती है। इस वर्ष ये अमावस्या 16 अप्रैल को पड़ रही है। हिन्दू धर्म में इस अमावस्या का विशेष महत्व है। विवाहित स्त्रियों द्वारा इस दिन अपने पती की लंबी उम्र के लिए व्रत रखने का विधान है। इस दिन मौन व्रत रहने से सहस्र गोदान का फल प्राप्त होता है। शास्त्रों में इसे अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत (यानि पीपल वृक्ष) की भी संज्ञा दी गई है। इस दिन विवाहित स्त्रियां पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन इत्यादि से पूजा करती हैं और वृक्ष के चारों ओर 108 बार धागा लपेटकर परिक्रमा करती हैं।

इस दिन भँवरी देने की भी परंपरा है। धान, पान और खड़ी हल्दी को मिला कर उसे विधान पूर्वक तुलसी के पेड़ पर चढ़ाया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का भी विशेष महत्व है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य समृद्ध, स्वस्थ्य और सभी दुखों से मुक्त होगा। ऐसा भी माना जाता है कि स्नान करने से पितरों की आत्माओं को शांति मिलती है।
ज्योतिषाचार्य पं. नरेंद्र दीक्षित बता रहे हैं उन उपायों के बारे में जो अापके जीवन की हर समस्या को दूर भगाएंगे।
जिसको पैसों की कमजोरी है वो तुलसी माता की 108 बार परिक्रमा करें। साथ ही श्री हरी नाम का जाप करें। एेसा करने से गरीबी से मुक्ति मिलेगी।
अमावस्या के दिन जो वृक्ष, लता आदि को काटता है और पत्तों को तोड़ता है उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता है। इसका उल्लेख विष्णु पुराण में भी किया गया है।
शनि अौर पितृदोष से छुटकारा पाने के लिए उड़द या उड़द की छिकले वाली दाल, काला कपड़ा, तला हुआ पदार्थ और दूध गरीबों को दान करें।
धन-धान्य व सुख संपदा पाने के लिए हर अमावस्या को छोटा सा आहुति प्रयोग करें। जिसमें काले तिल, जौं, चावल, गाय का घी, चंदन पाउडर, गुड़, देशी कपूर, गै चंदन या कण्डा का प्रयोग कर सकते हैं। इसके बाद सभी चीजों का मिश्रण बनाकर हवन कुंड में देवताअों का ध्यान करते हुए आहुति डालें।
सोमवती अमावस्या को लेकर प्रचलित कथा

एक गरीब ब्राह्मण परिवार था जिसमें पति, पत्नी और उनकी एक बेटी थी। बेटी धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी। समय के साथ-साथ उनकी बेटी सुंदर, संस्कारवान और गुणवान भी होती गई। तमाम गुण होने के बाद भी लड़की का विवाह नहीं हो पा रहा था, कारण था परिवार की गरीबी। एक दिन उस ब्राह्मण के घर एक साधु आए, जो कन्या के सेवाभाव से प्रभावित हुए और कन्या को लंबी आयु का आशीर्वाद देते हुए देखा कि कन्या के हाथ में विवाह योग्य रेखा ही नहीं थी। तब साधू ने कन्या के पिता को इसके लिए एक उपाय बताया कि कुछ दूरी पर एक गाँव में सोना नाम की धोबी जाति की एक महिला अपने बेटे और बहू के साथ रहती है, जो बहुत ही अच्छे आचार- विचार वाली और संस्कारवान तथा पति परायण है। यदि यह कन्या उसकी सेवा करे और वह महिला इसकी शादी में अपने मांग का सिन्दूर लगा दे, तो इस कन्या का वैधव्य योग मिट सकता है। साधू ने यह भी बताया कि वह महिला कहीं आती जाती नहीं है। यह बात सुनकर कन्या की मां ने अपनी बेटी से धोबिन की सेवा करने कि बात कही।

कन्या रोज प्रातःकाल ही उठ कर सोना धोबिन के घर जाकर, सफाई और अन्य सारे काम करके अपने घर वापस आ जाती। सोना धोबिन को लगता कि उसकी बहु सुबह जल्दी उठकर ये सारे काम करलेती है। एक दिन सोना धोबिन ने अपनी बहु से पूछा तुम इतनी जल्दी उठकर सारे काम कर लेती हो और पता भी नहीं चलता। तब बहू ने कहा कि मांजी मैंने तो सोचा कि आप सुबह उठकर सारे काम खुद ही कर लेती हैं। मैं तो देर से उठती हूँ। इस पर दोनों सोच में पड़ गईं, फिर दोनों योजना बनाकर निगरानी करने लगी कि कौन है जो इतनी सुबह घर का सारा काम करके चला जाता है। कई दिनों के बाद धोबिन ने देखा कि एक कन्या अंधेरे में घर में आती है और सारे काम करने के बाद चली जाती है। जब वह जाने लगी तो सोना धोबिन उसके पैरों पर गिर पड़ी, पूछने लगी कि आप कौन हैं और इस तरह छुपकर मेरे घर की चाकरी क्यों करती हैं। तब कन्या ने साधू की कही सारी बात उसे बताई, जिसे सुनकर सोना धोबिन साधू की बताई बात के लिए तैयार हो गई। सोना धोबिन कन्या के साथ जाने के लिए तैयार हो गई। उसने अपनी बहू से अपने लौट आने तक घर पर ही रहने को कहा। सोना धोबिन ने जैसे ही अपनी मांग का सिन्दूर कन्या की मांग में लगाया, उसका पति मर गया। उसे इस बात का पता चल गया। उस दिन सोमवती अमावस्या थी इसलिए वह घर से निर्जल ही निकली थी। ये सोचकर कि रास्ते में कहीं पीपल का पेड़ मिलेगा तो उसे भंवरी देकर और उसकी परिक्रमा करने के बाद ही जल ग्रहण करेगी। ब्राह्मण के घर मिले पकवान की जगह उसने ईंट के टुकडों से 108 बार भंवरी देकर पीपल के पेड़ की परिक्रमा की और उसके बाद जल ग्रहण किया। ऐसा करते ही उसके पति के मुर्दा शरीर में कम्पन होने लगा।
माना जाता है कि पीपल के पेड़ में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इसलिए सोमवती अमावस्या के दिन से शुरू कर जो भी व्यक्ति हर अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ को भंवरी देता है, उसके सुख और सौभग्य में वृद्धि होती है। या सोमवती अमावस्या के दिन 108 वस्तुओं की भंवरी देकर सोना धोबिन और गौरी-गणेश की पूजा करता है, उसे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। ऐसी परम्परा है कि पहली सोमवती अमावस्या के दिन धान, पान, हल्दी, सिन्दूर और सुपाड़ी की भंवरी दी जाती है। उसके बाद की सोमवती अमावस्या को अपने सामर्थ्य के हिसाब से फल, मिठाई, सुहाग सामग्री, खाने कि सामग्री इत्यादि की भंवरी दी जाती है। भंवरी पर चढ़ाया गया सामान किसी सुपात्र ब्राह्मण, ननद या भांजे को दिया जा सकता है। अपने गोत्र या अपने से निम्न गोत्र में वह दान नहीं देना चाहिए।

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