आज शनि प्रदोष की शाम सिर्फ एक डिया बना देगा हर काम

आज शनिवार के दिन यानि 19 अगस्त को भाद्रपद शनि प्रदोष पर्व मनाया जाएगा। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार हर माह के कृष्ण व शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी अर्थात तेरस तिथि परमेश्वर शिव को समर्पित है। त्रयोदशी को आम भाषा में प्रदोष भी कहते है।

शास्त्रनुसार शनि प्रदोष व्रत व पूजन शनि के अशुभ प्रभाव से बचाव के लिए सर्वोत्तम माना गया है।मान्यता अनुसार प्रदोष का पालन करने से सभी प्रकार के दोषों का नाश होता है।

शनि प्रदोष पर राजा दशरथ द्वारा रचित शनि स्तोत्र का पाठ करने से जीवन की सभी समस्याएं समाप्त होती हैं। शनि प्रदोष पूजन में काले शिवलिंग और शनिदेव के पूजन का बहुत बड़ा महत्व है।

विशेष पूजन: शनिदेव के चित्र का विधिवत पंचोपचार पूजन करें। तेल का दीपक करें, लोहबान धूप करें, सुरमा चढ़ाएं, शमीपत्र चढ़ाएं, रेवड़ी का भोग लगाएं। इस विशिष्ट मंत्र का 108 बार जाप करके नीचे लिखे हुए दशरथ कृत शनि स्तोत्र का 11 बार पाठ करें।

पूजन उपरांत रेवड़ियां गरीबों में बांट दें। प्रत्येक शनिवार को काले तिल, आटा, शक्कर लेकर इन तीनों चीजों को मिला लें। उसके बाद ये मिश्रण चींटियों को खाने के लिए डाल दें।

शनि से संबंधित बाधाअों से मुक्ति पाने के लिए काले घोड़े की नाल या नाव की कील से अंगूठी बनाकर अपनी मध्यमा उंगली में शनिवार के दिन सूर्यास्त के समय धारण करें।

तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें काले तिल डालें। उसके बाद ये जल शिवलिंग पर अर्पित करें। ऐसा करने से व्यक्ति को सभी रोगों से मुक्ति मिलेगी अौर भोलेनाथ की कृपा से आर्थिक तंगी दूर होगी।

https://youtu.be/cJUU7XNsXpU

”इसलिए नहीं लेनी चाहिए किन्नरो की बद्दुआ”, पुराण में छुपा हे यह रहस्य !

हमारे देश और समाज में किन्नरों को मुख्यधारा से जहाँ अलग माना जाता है और देखा जाये तो उन्हें सम्मान भी दिया जाता है. और दूसरी तरफ से देखा जाये तो उन्हें कई प्रकार की सामाजिक कुरीतियों तथा बुराइयों के बंधनों में बांधकर समाज से बिलकुल अलग भी रखा जा रहा है.

हकीकत में हमारा समाज विशेषकर सनातन धर्म हिन्दू धर्म में किन्नरों को बहुत ही अत्यधिक सम्मान दिया जाता है. इतना ही नहीं यह भी कहा जाता है कि किन्नर जिसको भी अपना आशीर्वाद दें, उसका भाग्य एकदम से चमक उठता है और जिसको भी बद्दुआ दे, उसके दुखों का फिर कोई अंत नहीं होता. ऐसे ही हम यहाँ जानेंगे किन्नर समाज से जुड़ी हुयी कुछ ऐसी ही अनोखी परंपराएं…

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के अनुसार वीर्य की बहुत अधिकता से पुत्र तथा रज की बहुत अधिकता से कन्या का उत्पन्न होना है. यदि होने वाली संतान के समय वीर्य और रज दोनों की समान मात्रा हो तो इन किन्नरों की उत्पत्ति होती है.

पुराने शास्त्र और ग्रंथों में भी किन्नरों का पूर्ण वर्णन किया गया है. रामायण के समकालीन ग्रंथों में इन्हें स्वर्गलोक के अंदर रहने और नृत्य, गायन, संगीत इत्यादि कलाओं में महारथी कहकर प्रशंसा की जाती रही है. महाभारत के अंदर भी अर्जुन के अज्ञातवास के दौरान किन्नर बनने का संदर्भ दिया हुआ है.

हमारे समाज में किन्नरों को मंगलमुखी भी कहा जाता है. इसीलिए घर में केसा भी शुभ अवसर जैसे शादी ब्याव , जन्म या अन्य किसी भी प्रकार के शुभ कामों में किन्नरों को सम्मान स्वरूप आमंत्रित कर इनसे आशीर्वाद लेते है. लेकिन घर में कोई भी मातम या घटना होने पर इन्हें बिलकुल नहीं बुलाया जाता.

यहां माता को श्रृंगार के रूप में चढ़ता है हथकड़ी और बेड़ियों का चढ़ावा, कारण चौंका देगा

मंदिर में जाते समय लोग अक्सर भगवान को भेंट के रुप में फूल-फल और तरह तरह के प्रसाद का चढ़ावा चढ़ाते हैं। लेकिन एक मंदिर ऐसा भी है जहां देवी माता को भेंट के रुप में हथकड़ी और बेड़ियां चढ़ाई जाती है। जानिए क्यों लोग देवी को ये अनोखी भेंट चढ़ा रहे हैं।

राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले के जोलर ग्राम पंचायत में ‘दिवाक माता’ का प्राचीन मंदिर है। ये वही मंदिर है जहां भक्त माता को हथकड़ी और बेड़ि‍यों का चढ़ावा चढ़ाने दूर दूर से पहुंचते हैं।

इस प्राचीन मंदिर के परिसर में गड़े 200 साल पुराने त्रिशूल में हजारों हथकड़ियां चढ़ाई गई हैं। बेड़िया और हथकड़ियां चढ़ाने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है।
कहा जाता है कि मालवा के जंगल में डाकुओं का राज हुआ करता था। डाकू जब भी इस मंदिर में आते तो माता को बेड़िया और हथकड़ी चढ़ाया करते थे। डाकू यहां मन्नत मांगा करते थे। जब भी वह पुलिस के चंगुल से बच जाते तो वे यहां आकर हथकड़ी और बेड़ियां चढ़ाते थे।
स्थानीय लोगों के अनुसार एक नामी डाकू पृथ्वीराणा ने जेल में दिवाक माता से मन्नत मांगी थी कि अगर वह जेल तोड़कर भागने में सफल रहा, तो वह सीधा यहां दर्शन करने के लिए आएगा। कुछ समय बाद ही उसकी बेड़ियां टूट गई और वह जेल से भागने में सफल हो गया।
तभी से यहां लोग अपने परिवार वाले लोगों को जेल से छुड़ाने के लिए इस मंदिर में हथकड़ी और बेड़ियां चढ़ाने आते हैं।

क्या राधा नाम सत्य है या फिर एक काल्पनिक चरित्र हैं!

वैष्णव साहित्य में राधा हैं ज्यादा प्रमुख

श्री कृष्ण के नाम के साथ राधा जी का नाम स्मरण होता ही है। आधुनिक काल के कृष्ण मंदिरों में उन्हें राधा जी के साथ ही देखा जाता है। मान्यतानुसार राधा ही वह आदि शक्ति हैं जिनसे श्री कृष्ण संपूर्णता को प्राप्त होते हैं। वैष्णव साहित्य तो श्री राधा को श्री कृष्ण से भी अधिक महत्वपूर्ण दर्ज़ा प्रदान करता नज़र आता है।

राधा नाम का आधार

किंतु राधा की सत्यता का आधार क्या है? क्या वाकई राधा जी का अस्तित्व था या फिर यह केवल कवि कल्पना मात्र चरित्र है? इस बारे में विविध पुराण और महाभारत क्या कहते हैं?

मूल ग्रंथों में राधा का कोई उल्लेख नहीं

वस्तुतः “राधा” का महाभारत, हरिवंश पुराण, विष्णु पुराण तथा श्री मद्भागवत में कोई भी नामोल्लेख नहीं है। अब यदि राधा तत्कालीन समय में इतनी ही महत्वपूर्ण चरित्र होतीं तो क्या वेदव्यास जैसे महर्षि उनको उल्लिखित करना भूल जाते? बाद के भी महत्वपूर्ण रचनाकारों ने राधा का नामोल्लेख करना उचित क्यों नहीं समझा?

कैसे हुआ राधा चरित्र का जन्म
इसका एक उत्तर यह हो सकता है कि महाभारत काल में राधा नाम का चरित्र था ही नहीं या फिर कृष्ण की राधा नाम की कोई प्रेयसी नहीं थी। अब यदि महाभारत, हरिवंश पुराण, विष्णु पुराण तथा भागवत में राधा हैं ही नहीं तो फिर इस विशिष्ट चरित्र का उद्भव कैसे हुआ? आइए हम इस तथ्य को जानने का प्रयत्न करते हैं:

ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा कवि जयदेव ही राधा का उल्लेख करते हैं
ऐसे सभी प्राचीन धर्मग्रंथों और साहित्य में, जिनमें श्रीकृष्ण का उल्लेख मिलता है उनमें से केवल दो – ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा कवि जयदेव ही राधा का उल्लेख करते हैं। हालांकि कई विद्वान श्रीमद् भागवत को आधार बनाते हुए राधा के चरित्र का विवरण देते हैं किंतु वास्तव में श्रीमद् भागवत के मूल पुस्तक में ऐसा कोई उल्लेख नहीं प्राप्य है।

राधा मात्र एक काल्पनिक चरित्र !
इसके आधार पर ऐसा माना जा सकता है कि राधा मात्र एक काल्पनिक चरित्र हैं जिनको श्रीमद् भागवत के पश्चात के ग्रंथों में उकेरा गया, यथा: ब्रह्मवैवर्त पुरान, गीत गोविंद तथा चैतन्य चरणामृत आदि।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में “राधा” का प्रथम साक्षात्कार
“राधा” नाम से प्रथम साक्षात्कार ब्रह्मवैवर्त पुराण में होता है जो सभी पुराणों में सबसे नया है। इस पुराण में श्रीकृष्ण और राधा से संबंधित कथा कुछ इस प्रकार है:

क्यों कलाकार दुर्गाप्रतिमा बनाने से पहले एक मुट्ठी वेश्या के आंगन की मिट्टी मिलाता है …

नवरात्र चाहे जितने भी पवित्र तरीके से क्यों न मनाए जाते हों, लेकिन इस अवसर पर देवी की मूर्तियां बनाने में जिस खास तरह की मिट्टी का इस्तेमाल होता है, वह मिट्टी सोनागाछी से आती है। सोनागाछी कोलकाता का रेडलाइट इलाका है।

दुर्गा मां ने अपनी भक्त वेश्या को उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर एक वरदान दिया था कि तुम्हारे हाथ से दी हुई गंगा की चिकनी मिट्टी से ही प्रतिमा बनेगी। उन्होंने उस भक्त को सामाजिक तिरस्कार से बचाने के लिए ऐसा किया। तभी से सोनागाछी की मिट्टी से देवी की प्रतिमा बनाने की परम्परा शुरू हो गई।

महालया के दिन ही दुर्गा मां की अधूरी गढ़ी प्रतिमा पर आंखें बनाई जाती हैं, जिसे चक्षु-दान कहते हैं। इस दिन लोग अपने मृत संबंधियों को तर्पण अर्पित करते हैं और उसके बाद ही शुरू हो जाता है देवी पक्ष। दुर्गा अपने पति शिव को कैलाश में ही छोड़ गणेेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ दस दिनों के लिए अपने पीहर आती है।

इन प्रतिमाओं को बनाने के लिए पहले लकड़ी के ढांचे पर जूट आदि बांध कर ढांचा तैयार करते हैं और उसके बाद मिट्टी के साथ धान के छिलके मिलाकर मूर्ति तैयार की जाती है। फिर प्रतिमा की साज-सज्जा की जाती है, जिसमें नाना प्रकार के गहने और वस्त्र उपयोग में लाए जाते हैं।

केवल दुर्गा की प्रतिमा को ही नहीं, बल्कि पांडालों को भी बहुत सुंदर तरह से बनाया जाता हैं। कोलकाता में बांस और कपड़े से अमृतसर का स्वर्ण मंदिर, पेरिस के एफिल टावर जैसा दुर्गा पांडाल बनाया जाता है। पंडालों की रोशनी से सारा शहर दुल्हन जैसा लगता है।

जानिए कोल्हापुर के इस महालक्ष्मी मंदिर का रहस्य | यह रहस्य आपको भी रहस्य में डाल देगा |

भारत में यूं तो कई ऐसे मंदिर हैं जिनको लेकर कई तरह की कहानियां और मान्यताएं प्रचलित हैं.

लेकिन आज हम बात कर रहे हैं महाराष्ट्र के एक ऐसे मंदिर के बारे में जिससे एक अजीबो-गरीब रहस्य जुड़ा हुआ है.

दरअसल ये महालक्ष्मी मंदिर महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है. इस महालक्ष्मी मंदिर को लेकर कहा जाता है कि इस मंदिर में स्थित खंभों से एक ऐसा रहस्य जुड़ा है जिसे सुलझाने में विज्ञान भी नाकाम साबित हुआ है.

आइए जानते हैं कि आखिर महालक्ष्मी मंदिर के खंभों से कौन सा रहस्य जुड़ा हुआ है जो आज भी पहेली बना हुआ है.

महालक्ष्मी मंदिर के खंभों से जुड़ा रहस्य

महालक्ष्मी मंदिर के चारों दिशाओं में एक-एक दरवाजा मौजूद है और इस मंदिर में मौजूद खंभों को लेकर मंदिर प्रशासन का दावा है कि यहां कितने खंभे है यह आज भी रहस्य ही है.

इस मंदिर के नक्काशियों वाले खंभे काफी मशहूर हैं लेकिन इन्हें आज तक कोई भी नहीं गिन पाया है. मंदिर प्रशासन की मानें तो कई बार लोगों ने इन्हें गिनने की कोशिश की लेकिन जिसने भी ऐसा किया उसके साथ कोई न कोई अनहोनी घटना देखने को मिली है.

1800 साल पुराना है यह महालक्ष्मी मंदिर

बताया जाता है कि महालक्ष्मी का यह मंदिर 1800 साल पुराना है और इस मंदिर में आदि गुरु शंकराचार्य ने देवी महालक्ष्मी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की थी.

लोगों की मान्यता के मुताबिक शालि वाहन घराने के राजा कर्णदेव ने इसका निर्माण करवाया था और आगे चलकर इसमें 35 छोटे-छोटे मंदिरों को भी बनवाया था. करीब 27 हज़ार वर्गफुट में फैला यह मंदिर माता के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है.

महालक्ष्मी मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यता

इस मंदिर को लेकर ऐतिहासिक मान्यता यह है कि यहां देवी सती के तीनों नेत्र गिरे थे. इस मंदिर में साल के एक खास समय में सूर्य की किरणें मुख्य मंदिर में मौजूद देवी की मूर्ति पर सीधे पड़ती है.

इस मंदिर में माता लक्ष्मी की चारभुजाओं वाली तीन फुट ऊंची मूर्ति स्थापित है. ऐसा माना जाता है कि तिरुपति यानी भगवान विष्णु से रुठकर माता लक्ष्मी कोल्हापुर में आईं थी.

मंदिर में छुपा है अरबों का खज़ाना

कहा जाता है कि माता के इस मंदिर के भीतर अरबों का खज़ाना छुपा हुआ है. करीब 3 साल पहले जब इस खज़ाने को खोला गया तो उसमें हजारों साल पुराने सोने, चांदी और हीरों के ऐसे आभूषण मिलें, बाज़ार में जिनकी कीमत अरबों रुपए में आंकी गई हैं.

इतिहासकारों की माने तो कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर में कोंकण के राजाओं, चालुक्य राजाओं, आदिल शाह, शिवाजी और उनकी मां जीजाबाई ने भी चढ़ावा चढ़ाया था. अरबों के इस खज़ाने की सुरक्षा के लिहाज से इसका बीमा भी कराया गया है.

करीब 1800 साल पुराने इस महालक्ष्मी मंदिर के साथ कई सारी ऐतिहासिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं, बात चाहे इसमें छुपे खज़ाने की हो या फिर इस मंदिर में मौजूद खंभों के रहस्य की. यहां की हर बात इस मंदिर को खास बनाती हैं और मंदिर के इन रहस्यों को करीब से जानने के लिए भी लोग यहां खींचे चले आते हैं.

सात पर्वतो के देवता भगवान वेंकेटेश्वर से जुडी इस कथा को जान हैरान हो जाओगे आप !

तिरुपति में निवास करने वाले भगवान वेंकेटेश्वर एक प्रसिद्ध हिन्दू देवता है, हर साल तिरुपति बालाजी के मंदिर में लाखो भक्तो की भी जमा होती है. भगवान वेंकेटेश्वर के मंदिर को भारत का सबसे आमिर मंदिर माना जाता. भगवान वेंकेटेश्वर अपनी पत्नी पद्यमावती के साथ तिरुपति के पहाड़ियों पर निवास करते है.

भगवान वेंकेटेश्वर को यहाँ सक्रिय एवम शक्तिशाली देवता के रूप में जाना जाता है. क्योकि जिस किसी भी भक्त ने सच्चे दिल से अपनी मनोकामना भगवान वेंकेटेश्वर के सामने रखी वे अवश्य पूरी हुई है. यहाँ लाखो भक्तो की मनोकामना पूरी हुई है.

जब भी किसी भक्त की मनोकामना भगवान वेंकेटेश्वर के मंदिर में पूरी होती है तो भक्त यहाँ आकर अपनी इच्छा से अपने बालो का दान करते है. भगवान वेंकेटेश्वर की लीला बहुत ही अनोखी एवम निराली है उसी तरह उनकी कथा भी बहुत ही विचित्र है.

आइये जानते है भगवान वेंकेटेश्वर से जुडी अनोखी कथा की कैसे उन्होंने तिरुमला के पर्वतो को अपना निवास स्थान बनाया.

एक बार ऋषि भृगु ज्ञान प्राप्ति के लिये सम्पूर्ण ब्रह्मांड का चक्कर लगा रहे थे. कहते है की ऋषि भृगु की एक आँख उनके पैर पे है.

ज्ञान प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम ऋषि भृगु ब्रह्मा जी के पास गए परन्तु उस समय ब्रह्मा जी भगवान विष्णु के मन्त्र जाप में लीन थे.

ब्रह्मा जी को व्यस्त देख ऋषि भृगु ने सोचा उन्हें भगवान शिव के पास चलना चाहिए. ज्ञान की प्राप्ति के लिए ऋषि भृगु भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत पहुचे,

बद्रीनाथ एवं केदारनाथ से जुडी एक भविष्यवाणी सुन, आप भी रह जाएंगे हैरान !

गंगा, जाह्नवी और भागीरथी कहलानी वाली ‘गंगा नदी’ भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है। यह मात्र एक जल स्रोत नहीं है, बल्कि भारतीय मान्यताओं में यह नदी पूजनीय है जिसे ‘गंगा मां’ अथवा ‘गंगा देवी’ के नाम से सम्मानित किया जाता है.

मरने के बाद लोग गंगा में अपनी राख विसर्जित करना मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक समझते हैं, यहाँ तक कि कुछ लोग गंगा के किनारे ही प्राण विसर्जन या अंतिम संस्कार की इच्छा भी रखते हैं। इसके घाटों पर लोग पूजा अर्चना करते हैं और ध्यान लगाते हैं। गंगाजल को पवित्र समझा जाता है तथा समस्त संस्कारों में उसका होना आवश्यक है। पंचामृत में भी गंगाजल को एक अमृत माना गया है।

लेकिन आज जिस रफ़्तार से धरती पर विकास हो रहा है उसमे प्राकृतिक संसाधनों की बहुत अनदेखी की जा रही है और अगर ऐसा चलता रहा तो भविष्य में गंगा नदी पुन: स्वर्ग चली जाएगी फिर गंगा किनारे बसे तीर्थस्थलों का कोई महत्व नहीं रहेगा और वे नाममात्र के तीर्थ स्थल होंगे.

केदारनाथ(kedarnath) को जहां भगवान शंकर का आराम करने का स्थान माना गया है वहीं बद्रीनाथ को सृष्टि का आठवां वैकुंठ कहा गया है, जहां भगवान विष्णु 6 माह निद्रा में रहते हैं और 6 माह जागते हैं.

पूरा देश गंगा का हत्यारा है: मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई. इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बद्रीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना.

अलकनंदा की सहचरणी नदी मंदाकिनी नदी के किनारे केदार घाटी है, जहां बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक सबसे महत्वपूर्ण केदारेश्वर है. यह संपूर्ण इलाका रुद्रप्रयाग जिले का हिस्सा है. रुद्रप्रयाग में भगवान रुद्र का अवतार हुआ था.

लेकिन 12 धाराओं में से अब अलकनंदा और उसकी सहयोगी मंदाकिनी का ही अस्तित्व बचा हुआ है. तीसरी आगे चलकर वह नदी जिसे गंगा कहा जाता है. लगातार हो रहे खनन, जंगल कटाई और नदी किनारे बढ़ रही जनसंख्या और धार्मिक क्रियाकांड के चलते जहां नदी का जलस्तर घटा है वहीं ये नदियां प्रदूषित भी हो गई है.

केदार घाटी में दो पहाड़ हैं- नर और नारायण पर्वत. विष्णु के 24 अवतारों में से एक नर और नारायण ऋषि की यह तपोभूमि है. उनके तप से प्रसन्न होकर केदारनाथ में शिव प्रकट हुए थे.

पुराणों अनुसार गंगा स्वर्ग की नदी है और इस नदी को किसी भी प्रकार से प्रदूषित करने और इसके स्वाभाविक रूप से छेड़खानी करने का परिणाम होगा संपूर्ण जंबूखंड का विनाश और गंगा का पुन: स्वर्ग में चले जाना.

वर्तमान में गंगा पूर्णत: प्रदूषित हो गई है और इसके जल की गुणवत्ता में भी परिवर्तन होने लगा है.

पुराणों अनुसार भूकंप, जलप्रलय और सूखे के बाद गंगा लुप्त हो जाएगी और बद्रीनाथ में नहीं होंगे भगवान के दर्शन, क्योंकि मान्यता अनुसार जोशीमठ में स्थित नृसिंह भगवान की मूर्ति का एक हाथ साल-दर-साल पतला होता जा रहा है.

भविष्यवाणी :-

माना जाता है कि जिस दिन नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे, बद्रीनाथ का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएगा. भक्त बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे.

Kedarnath aapda 2013 –
उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा इस बात की ओर इशारा करती है कि मनुष्य ने विकास के नाम पर तीर्थों को विनाश की ओर धकेला है और तीर्थों को पर्यटन की जगह समझकर मौज-मस्ती करने का स्थान समझा है तो अब इसका भुगतान भी करना होगा.

पुराणों अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में वर्तमान बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में भविष्यबद्री नामक नए तीर्थ का उद्गम होगा.

अलकनंदा और मंदाकिनी इन दोनों नदियों का पवित्र संगम रुद्रप्रयाग में होता है और वहां से ये एक धारा बनकर पुन: देवप्रयाग में ‘भागीरथी-गंगा’ से संगम करती हैं.

देवप्रयाग में गंगा उत्तराखंड के पवित्र तीर्थ ‘गंगोत्री’ से निकलकर आती है. देवप्रयाग के बाद अलकनंदा और मंदाकिनी का अस्तित्व विलीन होकर गंगा में समाहित हो जाता है तथा वहीं गंगा प्रथम बार हरिद्वार की समतल धरती पर उतरती है.

भगवान केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद बद्री क्षेत्र में भगवान नर-नारायण का दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे जीवन-मुक्ति भी प्राप्त हो जाती है. इसी आशय को शिवपुराण के कोटि रुद्र संहिता में भी व्यक्त किया गया है-

तस्यैव रूपं दृष्ट्वा च सर्वपापै: प्रमुच्यते.
जीवन्मक्तो भवेत् सोऽपि यो गतो बदरीबने..

दृष्ट्वा रूपं नरस्यैव तथा नारायणस्य च.
केदारेश्वरनाम्नश्च मुक्तिभागी न संशय:..

बद्रीनाथ की कथा अनुसार सतयुग में देवताओं, ऋषि-मुनियों एवं साधारण मनुष्यों को भी भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन प्राप्त होते थे. इसके बाद आया त्रेतायुग- इस युग में भगवान सिर्फ देवताओं और ऋषियों को ही दर्शन देते थे,

लेकिन द्वापर में भगवान विलीन ही हो गए. इनके स्थान पर एक विग्रह प्रकट हुआ. ऋषि-मुनियों और मनुष्यों को साधारण विग्रह से संतुष्ट होना पड़ा.

शास्त्रों अनुसार सतयुग से लेकर द्वापर तक पाप का स्तर बढ़ता गया और भगवान के दर्शन दुर्लभ हो गए. द्वापर के बाद आया कलियुग, जो वर्तमान का युग है.

पुराणों में बद्री-केदारनाथ (kedarnath) के रूठने का जिक्र मिलता है. पुराणों अनुसार कलियुग के पांच हजार वर्ष बीत जाने के बाद पृथ्वी पर पाप का साम्राज्य होगा. कलियुग अपने चरम पर होगा तब लोगों की आस्था लोभ, लालच और काम पर आधारित होगी. सच्चे भक्तों की कमी हो जाएगी.

ढोंगी और पाखंडी भक्तों और साधुओं का बोलबाला होगा. ढोंगी संतजन धर्म की गलत व्याख्या कर समाज को दिशाहीन कर देंगे, तब इसका परिणाम यह होगा कि धरती पर मनुष्यों के पाप को धोने वाली गंगा स्वर्ग लौट जाएगी.

http://www.mereprabhu.com/2016/05/mahabharat-ke-shraap-kalyug-ka-arambh/

अर्जुन के दिव्य धनुष गांडीव की 7 विशेषताएं, जिसे जान आप रह जाएंगे आश्चर्यचकित !

कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़े गए भीषण युद्ध में अर्जुन ने अपने दिव्य अस्त्र गांडीव के दम पर न केवल कौरवों की विशाल सेना बल्कि उस पक्ष में उपस्थित महान योद्धाओं को भी परास्त कर विजयी हासिल करी.

दिव्य धनुष गांडीव के कारण ही महाभारत युग में सभी लोग अर्जुन को महान धनुधर मानते थे. अर्जुन ने अपने इस प्रिय अस्त्र के लिए यह प्रतिज्ञा ली थी की जो भी व्यक्ति इस गांडीव धनुष को उनसे मांगेगा, वह उसी क्षण उसकी हत्या कर देंगे.

आइये जानते है की आखिर इस धनुष में ऐसी क्या खूबी थी जिसके आवाज मात्र से शत्रु भयभीत हो जाते थे.

1 . प्रभु श्री राम को गांडीव धनुष भगवान विष्णु के अंशावतार परशुराम जी से उस वक्त प्राप्त हुआ था जब देवी सीता के स्वयम्बर में श्री राम ने शिव धनुष तोड़ा तथा तब वहां परशुराम जी पधारे थे.

यह धनुष श्री राम जी से अर्जुन के पास कैसे पहुंचा इससे पहले यह जान लेते है की यह दिव्य धनुष आया कहा से था.

2 . विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार यह कथा मिलती है की इस दिव्य धनुष का निर्माण ब्र्ह्मा जी ने किया था तथा बाद में इस धनुष को उन्होंने संहारकर्ता भगवान शिव को प्रदान किया.

भगवान शिव ने यह दिव्य धनुष पाताल में राक्षसों के बढ़ते पाप को रोकने के लिए तथा उनके संहार के लिए परशुराम को दिया था.

रामायण काल के ऐसे श्राप, जिन्होंने हिला दी थी इतिहास की नींव !

रामायण काल के श्राप की कहानिया : –

1 . नंदी का रावण को श्राप :- एक बार रावण भगवान शिव से भेट करने कैलाश पर्वत गया तो बिछ मार्ग में ही रावण का समाना नंदी से हो गया. नंदी के मुख को देख रावण जोर-जोर से हसने लगा तथा उन्हें वानर कह क़र चिढ़ाने लगा. तब नंदी ने रावण को श्राप दिया की एक दिन वानरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा.

2 . राजा अनरण्य का रावण को श्राप :- वाल्मीकि रामायण के अनुसार रघुवंश में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था. जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुई. उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई. मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा. इन्हीं के वंश में आगे जाकर भगवान श्रीराम ने जन्म लिया और रावण का वध किया.

3 . तपस्वनी का रावण को श्राप :- वाल्मीकि रामयाण के अनुसार एक बार एक तपस्विनी भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए भगवान विष्णु की तपस्या क़र रही. आकाश मार्ग से जाते हुए रावण की नजर उस तपस्वनी पर पड़ी और वह उस पर आकर्षित हो गया. उसने तपस्विनी के बाल पकड़कर उसे लंका ले जाने की कोशिश करी परन्तु उस तपस्विनी ने अग्नि में भष्म होकर अपने प्राणो की आहुति दे दी तथा रावण को श्राप दिया की स्त्री के कारण ही तेरा नाश होगा.

4 . शूर्पणखा का रावण को श्राप :-वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था. वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था. रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ. उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का वध कर दिया. तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा.