महाभारत की एक अनसुनी कहानी- कैसे हुई थी गांधारी, कुंती और धृतराष्ट्र की मृत्यु, एक रहस्य

महाभारत एक ऐसा पौराणिक ग्रंथ है जिससे जुड़ी नाजाने कितनी ही कहानियां हम समय समय पर सुनते रहते हैं। इस ग्रंथ में कई पात्रों का समावेश है, जिसकी वजह से यह एक विस्तृत और विशाल गाथा में तब्दील हो गया है।

महाभारत और रामायण
जब हमें लगता है कि महाभारत की अधिकांश कहानियों से अब हम वाकिफ हैं तो एक नई कहानी हमारे सामने आ जाती है। सही बताएं तो वे लोग जो इस बात पर गुमान करते हैं कि वे महाभारत और रामायण की लगभग सभी घटनाओं या तथ्यों से अवगत हैं उन्हें भी कुछ ना कुछ ऐसा जरूर होगा जो नहीं पता होगा।

कहानियां
महाभारत की बात करें तो आज भी ऐसी बहुत सी कहानियां हैं जो हमारे रोंगटे खड़े कर देती हैं, जिन्हें सुनकर हम हैरानी में पड़ जाते हैं कि क्या वाकई ऐसा हो सकता है।

कौरवों का संहार
इन्हीं कहानियों में से एक है गांधारी, धृतराष्ट्र और कुंती की मृत्यु से जुड़ी घटना। कुरुक्षेत्र के युद्ध कौरवों का संहार हो गया था और पांडवों की मृत्यु उनके महाप्रस्थान के दौरान हुई थी। भीष्म पितामाह ने मृत्यु शैया पर अपना दम तोड़ा था, लेकिन कुंती, धृतराष्ट्र और गांधारी की मृत्यु कैसे हुई इस बात पर शायद किसी का ध्यान नहीं गया।

युयुत्सु
कुरुक्षेत्र के युद्ध में धृतराष्ट्र ने अपने 99 बेटों को खो दिया था। युयुत्सु ने पांडवों की ओर से युद्ध लड़ा था इसलिए मात्र एक वही एकमात्र कौरव थ जो जीवित रह गया था।

साक्ष्य
पांडवों ने भी अपने पुत्र, अभिमन्यु और उसकी अजन्मीं संतान को खोया था। महाभारत का युद्ध, इतिहास के बड़े औइर भयंकर युद्धों में से एक था, जिसका साक्ष्य कुरुक्षेत्र की वो मिट्टी जिसका रंग आज भी लाल है।

कैसे हुई थी श्री कृष्ण जी की मृत्यु ,कैसे ख़त्म हुआ श्रीकृष्ण सहित पूरा यदुवंश ?

अठारह दिन चले महाभारत के युद्ध में रक्तपात के सिवाय कुछ हासिल नहीं हुआ। इस युद्ध में कौरवों के समस्त कुल का नाश हुआ, साथ ही पाँचों पांडवों को छोड़कर पांडव कुल के अधिकाँश लोग मारे गए। लेकिन इस युद्ध के कारण, युद्ध के पश्चात एक और वंश का खात्मा हो गया वो था ‘श्री कृष्ण जी का यदुवंश’।
गांधारी ने दिया था यदुवंश के नाश का श्राप :

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा। गांधारी के श्राप से विनाशकाल आने के कारण श्रीकृष्ण द्वारिका लौटकर यदुवंशियों को लेकर प्रयास क्षेत्र में आ गये थे। यदुवंशी अपने साथ अन्न-भंडार भी ले आये थे। कृष्ण ने ब्राह्मणों को अन्नदान देकर यदुवंशियों को मृत्यु का इंतजार करने का आदेश दिया था। कुछ दिनों बाद महाभारत-युद्ध की चर्चा करते हुए सात्यकि और कृतवर्मा में विवाद हो गया। सात्यकि ने गुस्से में आकर कृतवर्मा का सिर काट दिया। इससे उनमें आपसी युद्ध भड़क उठा और वे समूहों में विभाजित होकर एक-दूसरे का संहार करने लगे। इस लड़ाई में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न और मित्र सात्यकि समेत सभी यदुवंशी मारे गये थे, केवल बब्रु और दारूक ही बचे रह गये थे। यदुवंश के नाश के बाद कृष्ण के ज्येष्ठ भाई बलराम समुद्र तट पर बैठ गए और एकाग्रचित्त होकर परमात्मा में लीन हो गए। इस प्रकार शेषनाग के अवतार बलरामजी ने देह त्यागी और स्वधाम लौट गए।

बहेलिये का तीर लगने से हुई श्रीकृष्ण की मृत्यु

बलराम जी के देह त्यागने के बाद जब एक दिन श्रीकृष्ण जी पीपल के नीचे ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए थे, तब उस क्षेत्र में एक जरा नाम का बहेलिया आया हुआ था। जरा एक शिकारी था और वह हिरण का शिकार करना चाहता था। जरा को दूर से हिरण के मुख के समान श्रीकृष्ण का तलवा दिखाई दिया। बहेलिए ने बिना कोई विचार किए वहीं से एक तीर छोड़ दिया जो कि श्रीकृष्ण के तलवे में जाकर लगा। जब वह पास गया तो उसने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में उसने तीर मार दिया है। इसके बाद उसे बहुत पश्चाताप हुआ और वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीकृष्ण ने बहेलिए से कहा कि जरा तू डर मत, तूने मेरे मन का काम किया है। अब तू मेरी आज्ञा से स्वर्गलोक प्राप्त करेगा।

बहेलिए के जाने के बाद वहां श्रीकृष्ण का सारथी दारुक पहुंच गया। दारुक को देखकर श्रीकृष्ण ने कहा कि वह द्वारिका जाकर सभी को यह बताए कि पूरा यदुवंश नष्ट हो चुका है और बलराम के साथ कृष्ण भी स्वधाम लौट चुके हैं। अत: सभी लोग द्वारिका छोड़ दो, क्योंकि यह नगरी अब जल मग्न होने वाली है। मेरी माता, पिता और सभी प्रियजन इंद्रप्रस्थ को चले जाएं। यह संदेश लेकर दारुक वहां से चला गया। इसके बाद उस क्षेत्र में सभी देवता और स्वर्ग की अप्सराएं, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि आए और उन्होंने श्रीकृष्ण की आराधना की। आराधना के बाद श्रीकृष्ण ने अपने नेत्र बंद कर लिए और वे सशरीर ही अपने धाम को लौट गए।

श्रीमद भागवत के अनुसार जब श्रीकृष्ण और बलराम के स्वधाम गमन की सूचना इनके प्रियजनों तक पहुंची तो उन्होंने भी इस दुख से प्राण त्याग दिए। देवकी, रोहिणी, वसुदेव, बलरामजी की पत्नियां, श्रीकृष्ण की पटरानियां आदि सभी ने शरीर त्याग दिए। इसके बाद अर्जुन ने यदुवंश के निमित्त पिण्डदान और श्राद्ध आदि संस्कार किए।

इन संस्कारों के बाद यदुवंश के बचे हुए लोगों को लेकर अर्जुन इंद्रप्रस्थ लौट आए। इसके बाद श्रीकृष्ण के निवास स्थान को छोड़कर शेष द्वारिका समुद्र में डूब गई। श्रीकृष्ण के स्वधाम लौटने की सूचना पाकर सभी पाण्डवों ने भी हिमालय की ओर यात्रा प्रारंभ कर दी थी। इसी यात्रा में ही एक-एक करके पांडव भी शरीर का त्याग करते गए। अंत में युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग पहुंचे थे।

वानर राज बाली ही था ज़रा बहेलिया

संत लोग यह भी कहते हैं कि प्रभु ने त्रेता में राम के रूप में अवतार लेकर बाली को छुपकर तीर मारा था। कृष्णावतार के समय भगवान ने उसी बाली को जरा नामक बहेलिया बनाया और अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी बाली को दी थी।

महाभारत के लिए क्यों चुना गया कुरुक्षेत्र- एक रहस्य!

महाभारत युद्ध और गीता की रचना कुरुक्षेत्र में युद्ध भूमि में हुई.

लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ, जो युद्ध के लिए इस जगह का चुनाव किया गया और सारे वीर, ऋषि, गुरु सबने युद्ध में प्राण त्याग दिए .

तो आइये जानते है कुरुक्षेत्र का राज़ –

कुरु एक बहुत तेजस्वी और प्रतापी राजा था. इस राजा के आधीन में आने वाले क्षेत्र को कुरुक्षेत्र कहा जाता है.
कुरुक्षेत्र के इस भाग को राजा कुरु अपने हाथो से जोतते और अन्न उगाते थे.
राजा कुरु इस जगह को एक मोक्ष प्राप्ति की जगह बनना चाहते थे.
राजा कुरु पर इंद्र की कृपा हो गई और इंद्र के वरदान से यह जगह मोक्षप्राप्ति की जगह बन गई.
राजा कुरु का विवाह शुभांगी से हुआ. इनकी संतान विदुरथ हुई और इनकी पीढ़ी आगे बढ़ी – जिसमे धृतराष्ट्र और पांडू हुए – धृतराष्ट्र की संतान कौरव और पांडू की संतान पांडव हुए.
यह सब एक वंश की बेला थी. कौरवो और पांडवो दोनों पाप कर्म में डूबे हुए थे.
श्री कृष्ण और भीष्म पितामह को इस कुरुक्षेत्र को मिले वरदान का ज्ञान था.
इस जगह में मरने वाले हर जीव, जन्तु, पशु, पक्षी, और इन्सांनो को मोक्ष मिलना ही था.
इसलिए कुरु के कुल और सारे वीर योद्धा, ऋषियों, गुरुओं को मोक्ष दिलाने के लिए ही कुरुक्षेत्र का चुनाव किया गया.
इस पाप से मुक्ति दिलाने के लिए ही महाभारत युद्ध हुआ और इसके लिए इस जगह का चयन कर अपने कुल को मुक्ति दिलाई.
इस जगह में जितने लोगो की मौत हुई वह अधर्मी होते हुए भी, पाप मुक्त होकर, मोक्ष को प्राप्त कर, इतिहास की रचना कर गए.
कुरुक्षेत्र एक वरदान प्राप्त भूमि थी, जहाँ किसी भी जीव जन्तु इंसान की मृत्यु हुई तो उनको मोक्ष की प्राप्ति होनी ही थी. इसलिए इस जगह का चुनाव महाभारत युद्ध के लिए किया गया था.

किसके मोह में विवश हुए छलिया श्रीकृष्ण ! क्यों किया एकलव्य का वध छल से !

एकलव्य का वध!

ये तो सभी जानते हैं कि भीलपुत्र एकलव्य ने गुरू द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर धनुष विद्या की शिक्षा ली.

जब द्रोणाचार्य को इस बात का पता चला तो उन्होंने गुरु दक्षिणा में एकलव्य के दाहिने हाथ का अंगूठा ही मांग लिया ताकि वो कभी अपनी चार उंगलियों से धनुष न चला सके.

अर्जुन को महाभारत की कहानी का सबसे बड़ा नायक कहा गया.

इतना ही नहीं अर्जुन को सबसे बेहतरीन और अचूक धनुरधारी की उपाधि भी दी गई. लेकिन सबसे बड़े धनुरधारी अर्जुन के तीर भी एकलव्य के तीर के आगे अपना निशाना चूक जाते थे.

एकलव्य को रास्ते से हटाना किसी के लिए भी आसान काम नहीं था.

एकलव्य तीर न चला सके इसके लिए द्रोणाचार्य ने उसका अंगूठा ही मांग लिया और खुद भगवान श्रीकृष्ण ने छल का सहारा लेकर एकलव्य का वध किया.

लेकिन यहां सवाल है कि आखिर श्रीकृष्ण किससे इतना अधिक प्रेम करते थे कि उसकी राह को आसान बनाने के लिए भगवान होते हुए भी खुद इतने बड़े छल का सहारा लेकर एकलव्य का वध किया.
श्रीकृष्ण को था अर्जुन से प्रेम

जब महाभारत युद्ध समाप्त हुआ तब सभी पांडव अपनी-अपनी वीरता का बखान करने लगे.

तब यही वो मौका था, जब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अपने प्रेम की बात को कबूल करते हुए कहा था कि उन्होंने छल से एकलव्य का वध किया था.

इतना ही नहीं महाभारत की लड़ाई में श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी भी बने थे.
अर्जुन के लिए किया छल

श्रीकृष्ण ने अपने छल की बात को स्वीकर करते हुए अर्जुन से कहा कि ‘तुम्हारे मोह में मैंने क्या-क्या नहीं किया. तुम संसार में सर्वश्रेष्ठ धनुरधारी के रुप में जाने जाओ इसके लिए मैंने द्रोणाचार्य का वध करवाया और न चाहते हुए भी भील पुत्र एकलव्य को वीरगित दी ताकि तुम्हारे रास्ते में कोई बाधा न आए’
एकलव्य के पराक्रम से हैरान हुए कृष्ण

निषाद वंश का राजा बनने के बाद एकलव्य ने जरासंध की सेना की तरफ से मथुरा पर आक्रमण किया. इस आक्रमण के दौरान एकलव्य ने यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था.

यादव वंश में हाहाकर मचने के बाद जब कृष्ण ने दाहिने हाथ में महज चार अंगुलियों के सहारे धनुष बाण चलाते हुए एकलव्य को देखा तो वे हैरत में पड़ गए क्योंकि उन्हें इस दृश्य पर विश्वास ही नहीं हुआ.
वीरगति को प्राप्त हुआ एकलव्य

धनुरधारी एकलव्य अकेले ही पूरे यादव वंश के योद्धाओं को रोकने में सक्षम था. इसी युद्ध में श्रीकृष्ण ने छल से एकलव्य का वध किया जबकि एकलव्य का पुत्र केतुमान भीम के हाथों मारा गया.

गौरतलब है कि अर्जुन की जीत की राह में किसी तरह की बाधा न आए इसलिए श्रीकृष्ण ने छल किया और एकलव्य का वध करते हुए उनको अपने हाथों वीरगति प्रदान की.
जिन लोगों को सदाचारी और हमेशा धर्म की राह पर चलनेवाला बताया गया था उन्हीं लोगों ने महाभारत की कहानी में सबसे ज्यादा छल किया. और एकलव्य जैसे पारंगत धनुर्धारी के लिए सबसे ज्यादा क्रूर साबित हुए.

चाहे वो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हो या फिर गुरू द्रोणाचार्य.

आखिर क्यों श्री कृष्ण को महाभारत युद्ध में 18 दिन तक खानी पड़ी मूंगफली, एक अनोखा रहस्य !

वासुदेव श्री कृष्ण ने अपने सम्पूर्ण जीवन काल में अनेको एवम अद्भुत लीलाये रची, महाभारत के भीषण युद्ध में बगैर अश्त्र एवम शस्त्र उठाये उन्होंने पांडवो को जीत दिला दी. भगवान श्री कृष्ण के अनेको लीलाओ में से एक बहूत अजीब लीला उन्होंने महाभारत युद्ध के दौरान रची.

महाभारत युद्ध के प्रत्येक दिन भगवान श्री कृष्ण मूंगफली खाते तथा फिर युद्ध की औऱ प्रस्थान करते. ये उनका दैनिक नियम बन चुका था की जैसे ही युद्ध प्रारम्भ होता उससे पहले वह कुछ मूंगफलियां अपने मुह में डाल लेते.

वास्तव में भगवान श्री कृष्ण के मूंगफली खाने के पीछे एक गहरा रहस्य छुपा हुआ था जिसे सिर्फ एक ही व्यक्ति जानता था औऱ वह थे उडुपी राज्य के राजा.

इस अनोखे रहस्य के पीछे कथा है की जब महाभारत का युद्ध पांडवो औऱ कौरवो के बीच छिड़ा तो दोनों पक्षो ने देश विदेश के राजाओ को युद्ध में उनकी तरफ से सम्मलित होने के लिए सन्देश भेजा.

सूचना मिलते है अनेको राजा युद्ध में सम्मलित हुए कुछ पांडवो के पक्ष से लड़े तो कुछ कौरवो के पक्ष से परन्तु उन अनेको राजाओ में से एक राजा ऐसे भी थे जो किसी के पक्ष से न लड़ते हुए भी युद्ध में सम्मलित हुए.

जब दुर्योधन ने चली एक ऐसी चाल, जिससे पांडव भी हो गये थे चारो खाने चित्त !

जब महाभारत युद्ध आरम्भ हो रहा था तब कौरव और पांडवो दोनों ने अपने अपने दूत इधर उधर के राजाओ के पास सहायता के लिए भेजी. मद्रराज शल्य को भी जब इस सुचना मिली तो वे अपने पुत्रो एवम अक्षोहणी सेना के साथ पांडवो के पास चले.

शल्य की बहन माद्री पाण्डु की पत्नी थी इसी कारण नकुल एवम सहदेव उनके सगे भांजे थे. पांडवों को विश्वास था कि शल्य उनके पक्ष में ही रहेंगे.

शल्य की विशाल सेना दो-दो कोस पर पड़ाव डालती चल रही थीं. दुर्योधन को समाचार पहले ही मिल गया था. उसने मार्ग में जहां-जहां सेना के पड़ाव के उपयुक्त स्थानों पर कारीगर भेजकर सभा-भवन एवं निवास स्थान बनवा दिए.हर पड़ाव पर बेहतर भोजनादि की व्यवस्था करवा दी गई थी.

मद्रराज शल्य और उनकी सेना का मार्ग में सभी पड़ावों पर भरपूर स्वागत हुआ. शल्य यही समझते थे कि यह सब व्यवस्था युधिष्ठिर ने की है.

हस्तिनापुर के पास पहुंचने पर विश्राम स्थलों उसे देखकर शल्य ने पूछा-‘युधिष्ठिर के किन कर्मचारियों ने यह व्यवस्था की है? उन्हें ले आओ. मैं उन्हें पुरस्कार देना चाहता हूं.’

जब देव राज इंद्र के आगे फीकी पड़ी शकुनि की हर चाल, महाभारत से जुड़ा अनोखा तथ्य !

शकुनी ने युधिष्ठिर को कई बार चौपड़ के खेल में हराया और जिसका परिणाम द्रौपदी का चीर हरण और पांडवों को वनवास फिर अज्ञातवास मिला. लेकिन शकुनी की चाल का जवाब देवराज इंद्र ने ऐसा दिया कि शकुनी चारो खाने चित्त हो गए.

महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण को हराना अर्जुन के लिए कठिन था. इंद्र को अंदेशा था कि सूर्य के कवच के कारण कर्ण अर्जुन को पराजित न कर दे.

इसलिए इंद्र ब्रह्मण बनकर इंद्र के पास दान मांगने पहुंच गए. दान में इन्होंने कर्ण से कवच और कुंडल मांग लिया जिससे शकुनी और दुर्योधन का कर्ण को सेनापति बनाने की चाल नाकामयाब हुई.

शकुनी ने जुए में जब पांडवों को हरा दिया और 12 वर्ष का वनवास और एक साल का अज्ञातवास दिया तब इंद्र ने अज्ञातवास के दौरान अर्जुन की पहचान छिपाने के लिए गजब की चाल चली.

इंद्र ने दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए अर्जुन को स्वर्ग बुलाया यहां अर्जुन को उर्वशी नाम की अप्सरा से नपुंसक होने का शाप मिल गया.

आखिर अर्जुन का पुत्र क्यों पूजा जाने लगा भगवान के रूप में

महाभारत की एक अनसुनी कथा 

हमारे हिन्दू धर्म में देवी-देवताओ को पूजने की मान्यता है. जैसे महादेव शिव को असुरो एवं देवो दोनों के देव के रूप में जाना एवं पूजा जाता है. वही भगवान श्री कृष्ण को प्रेम एवं धर्म के देव के रूप में पूजा जाता है.

परन्तु क्या आप जानते है की महाभारत के प्रसिद्ध पात्र अर्जुन के पुत्र को भी भगवान के रूप में पूजा जाता है, आज हम आपको महाभारत के एक विचित्र कथा के रूप में बताने जा रहे है जिसमे हम आपको बताएंगे की आखिर अर्जुन के उस पुत्र का क्या नाम था और कौन उन्हें पूजते है.

महाभारत के इस कथा के अनुसार एक बार अर्जुन को द्रोपदी के साथ विवाह की एक शर्त का उल्लंघन करने के कारण एक वर्ष के लिए इंद्रप्रस्थ से निष्कासित करा दिया.

राज्य से एक वर्ष के लिए निष्कासित होने के पश्चात अर्जुन उत्तर-पूर्व भारत की ओर बढे. वहां उनकी भेट एक विधवा राजकुमारी नागिन से हुई .

अर्जुन उस नाग कन्या पर आकर्षित हो जाते है तथा दोनों एक दूसरे से विवाह कर लेते है. विवाह के कुछ समय पश्चात अर्जुन एवं उलूपी का एक पुत्र हुआ जिसका नाम उन्होंने अरावन रखा.

कुरुक्षेत्र के मैदान में हुई थी एक और महाभारत

जो चली थी 18 दिन से भी ज्यादा ”अनोखा रहस्य” !

महाभारत के प्रसिद्ध पात्र एवं गंगा पुत्र भीष्म को परशुराम ने अस्त्रों शास्त्रों की विद्या दी थी. युद्ध में पारंगत भीष्म अजेय थे कोई भी उन्हें युद्ध की चुनौती देने से घबराता था.

एक दिन काशी राज्य के राजा ने अपनी पुत्रियों के विवाह के लिए स्वयम्बर का आयोजन किया. काशी नरेश के तीनो पुत्रिया अत्यधिक सुन्दर एवं गुणवान थी जिनका नाम अम्बा, अम्बिका एवं अम्बाला था. उनके स्वयंबर में बहुत दूर दूर से राजा महाराजा काशी नरेश पधारे.

शांतुन पुत्र भीष्म ने भी उस स्वयम्बर में हिस्सा लिया. क्योकि उस समय तक भीष्म काफी वृद्ध हो चले थे तो उन्हें देख लोगो समझने हसने लगे. वहां उपस्थित सभी लोग यह सोच रहे थे की भीष्म अपने विवाह के लिए यहाँ आये है. परन्तु वास्तविकता में भीष्म को अपने भाई विचित्रवीर्य के विवाह के लिए सुन्दर कन्या के तलाश थी.

स्वयम्बर में पधारे राजाओ के व्यवहारों से भीष्म पितामह को काफी आहत पहुंची तथा गुस्से में उन्होंने तीनो राजकुमारियों का हरण कर लिया. वहां आये राजा महाराजो ने उन्हें रोकने का प्रयास किया परन्तु अजेय भीष्म के आगे कोई भी नहीं टिक सका, सब को युद्ध में मुंह की खानी पड़ी.

तीनो राजकुमारियों को हरण कर भीष्म उन्हें हस्तिनापुर में लाये उन दिनों राजपूतो द्वारा राजकुमारियों के हरण कर शादी करने की प्रथा थी.

जब इन तीनों राजकुमारियों के विवाह की तैयारियाँ हो रही थीं तो राजकुमारी अम्बा इससे प्रसन्न नहीं थी. भीष्म के पूछने पर उसने कहा कि वह राजा शल्य से प्यार करती है. इसलिए विचित्रवीर्य से विवाह नहीं कर सकती.

क्यों करना पड़ा श्री कृष्ण को कर्ण का अंतिम संस्कार

कोंन थे दानवीर कर्ण जाने उनकी पूरी कहानी जनम से मृत्यु तक :-

महाभारत का युद्ध ( mahabharat yuddha )अधर्म पर धर्म की विजय को दर्शाता है जिसमे भगवान् श्री कृष्ण का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान था. जब दुर्योधन ने अपनी तरफ सेना मांगी तो श्री कृष्ण को पांडवो की तरफ होना पड़ा . महाभारत में कौरवों और पांडवो की सेना में अनेको योद्धा थे जिन्होंने युद्ध में विशेष भूमिका निभाई और वीरगति को प्राप्त हुए तथा अपना नाम सदा सदा के लिए महाभारत ग्रन्थ में लिख दिया.

इन्ही योद्धाओं में से एक था दानवीर कर्ण जो कौरवों की तरफ से लड़े और वीरगति को प्राप्त हुए लेकिन आज हम आपको कुछ दानवीर कर्ण के बारे में कुछ ऐसी बातें बताएँगे जो सायद ही आपने पहले कभी सुनी होंगी.

आप सब जानते है की कर्ण के पिता सूर्य और माता कुंती थी और पांडवो के ज्येष्ठ भ्राता थे, पर उनका पालन एक रथ चलाने वाले ने किया था, इसलिए वो सूतपुत्र कहलाएं और इसी कारण उन्हें वो समाज में कभी सम्मान नहीं मिला, जिसके वो अधिकारी थे। इस लेख में आज हम महारथी कर्ण से सम्बंधित कुछ रोचक बातें जानेंगे।

कर्ण के वध में भगवान् श्री कृष्ण का बहुत योगदान था जिन्होंने अर्जुन को कर्ण वध का रास्ता सुझाया. भगवान् श्री कृष्ण जानते थे की कर्ण बहुत ही दानवीर योद्धा थे लेकिन जब कर्ण मृत्युशैया पर थे तब कृष्ण उनके पास उनके दानवीर होने की परीक्षा लेने के लिए आए। कर्ण ने कृष्ण को कहा कि उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। ऐसे में कृष्ण ने उनसे उनका सोने का दांत मांग लिया।

कर्ण ने अपने समीप पड़े पत्थर को उठाया और उससे अपना दांत तोड़कर कृष्ण को दे दिया। कर्ण ने एक बार फिर अपने दानवीर होने का प्रमाण दिया जिससे कृष्ण काफी प्रभावित हुए। कृष्ण ने कर्ण से कहा कि वह उनसे कोई भी वरदान मांग़ सकते हैं।

कर्ण ने कृष्ण से कहा कि एक निर्धन सूत पुत्र होने की वजह से उनके साथ बहुत छल हुए हैं और पूरी जिंदगी मुझे हालत के साथ समझौता करना पड़ा. इसीलिए अगली बार जब कृष्ण धरती पर आएं तो वह पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन को सुधारने के लिए प्रयत्न करें. इसके साथ कर्ण ने दो और वरदान मांगे.

दूसरे वरदान के रूप में कर्ण ने यह मांगा कि अगले जन्म में कृष्ण उन्हीं के राज्य में जन्म लें और तीसरे वरदान में उन्होंने कृष्ण से कहा कि उनका अंतिम संस्कार ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहां कोई पाप ना हो।