सीताजी ने दो नहीं, एक ही पुत्र को जन्म दिया था

लव कुश के जन्म की कहानी

रामायण काल के जिस प्रसंग की आज हम यहां चर्चा करने जा रहे हैं, वह श्रीराम एवं सीता जी और लक्ष्मण के वनवास से वापस अयोध्या आने के बाद की घटना पर है। यह वह समय है जब श्रीराम एवं सीता जी को पहली बार पता चलता है कि वे माता-पिता बनने वाले हैं।

सीता जी ने किया गर्भधारण
यह सूचना मिलने पर कि सीता जी गर्भवती हैं, पूरे महल में खुशियों का माहौल बन गया, श्रीराम के साथ-साथ परिवार के सभी सदस्य अत्यंत प्रसन्न थे। लेकिन इन खुशियों के जाने का और दुखों के आने का समय दूर नहीं था।

अयोध्या में फैला गलत माहौल
जल्द ही यह बात सबके समक्ष आने लगी कि सीता जी अपने पति से दूर एक पराए लंका में रहकर आई हैं, लेकिन सब जानते हुए भी श्रीराम ने उन्हें अपने जीवन में पनाह दी है। यह ऐसा समय था जब पत्नी यदि एक रात भी अपने पति से दूर रहती थी, तो उसे दोबारा पति के घर में दाखिल होने की अनुमति नहीं मिलती थी।

सीता जी स्वयं चली गईं
लेकिन लंबे समय के लिए रावण की लंका में रहने के बावजूद भी सीता जी अयोध्या के महल में सुखी थीं। यह देख अयोध्या की सभी पत्नियां भी अपने पति का विरोध करने लगीं। अब बात श्रीराम तक आ पहुंची, इस स्थिति को देखते हुए सीता जी ने स्वयं ही अयोध्या छोड़कर चले जाने का फैसला कर लिया।

आज भी जिन्दा है रावण की बहन शूपर्णखा -आज भी लोग जाते है उसके दरबार में

शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो शूर्पणखा को नहीं जानता होगा.
जब राम वनवास कर रहे थे तब लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक और कान काट लिए थे और बाद में रावण ने इसी वजह से माता सीता का अपहरण किया था. रावण ने ऐसा इसलिए किया था क्योकि शूर्पणखा रावण की बहन थी.

अब आप बोलेंगे कि हम आपको यह कहानी ना जाने क्यों बता रहे हैं क्योकि आप इस कहानी से अच्छी तरह से वाकिफ हैं.

तो आज हम आपको बताने वाले हैं कि रावण की बहन शूर्पणखा आज भी जिन्दा है. हम यह बात मजाक में नहीं बल रहे हैं. शूर्पणखा जिन्दा है और बकायदा इसके यहाँ आशीर्वाद लेने नेता और बड़े-बड़े क्रिकेटर खिलाड़ी आते रहते हैं. लोग बताते हैं कि रावण की बहन शूर्पणखा के पास आज भी काफी शक्तियां हैं. वह लोगों के सामने ही बारिश करा देती है और बारिश रुकवा भी देती है. वह लोगों की बीमारियाँ भी हाथ लगाते ही सही भी कर देती है.

तो अब आपको यह सब पढ़कर जरूर हैरानी और आश्चर्य हो रहा होगा. तो चलिए आइये आपको आज हम रावण की बहन शूर्पणखा से मिलवाते हैं-

श्रीलंका में रहती है रावण की बहन शूर्पणखा

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो शहर से सटे कस्बा कोट्टे में एक महिला रहती है. इस महिला का नाम गंगा सुदर्शनी है. यह महिला खुद को शूर्पणखा का ही अवतार बताती है. बताते हैं कि जब इस महिला का जन्म हुआ तो इस महिला के नाक और कानों पर कट के निशान थे. यह निशान ऐसे थे कि जैसे किसी ने इसकी नाक को काटा हो. वैसे आज यह महिला श्रीलंका की वीवीआईपी है. सभी लोग इस महिला को रावण की बहन शूर्पणखा का ही अवतार मानते हैं.

वैसे यह महिला कोई साधारण महिला नहीं है. भारत के एक बड़े दिग्गज न्यूज़ चैनल ने इस बात की खोज करने के लिए गंगा सुदर्शनी के यहाँ पर डेरा डाला था. खुद रिपोर्टर बताते हैं कि यह महिला इतनी शक्तिशाली है कि वह बारिश तक रुकवा देती है. गंगा जी खुद को रावण की बहन शूर्पणखा का ही अवतार बताती हैं और इनके पास एक से एक बड़ी शक्तिशाली हस्तियाँ आशीर्वाद लेने आती है. इनके यहाँ एक रावण औषधी तैयार की जाती है जिसकी डिमांड पूरे श्रीलंका में भारी मात्रा में है.

राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने !

अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया. राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी. राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी.

अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी. जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी.

युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी. अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हर राजा दशरथ की ही होगी.

राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए. तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के साथ वापस अयोध्या लौटना पड़ा.

रानी कैकयी को यह बात बहुत दुखी, आखिर एक स्त्री अपने पति के अपमान को अपने सामने कैसे सह सकती थी. यह बात उन्हें हर पल काटे की तरह चुभने लगी की उनके कारण राजा दशरथ को अपना मुकुट छोड़ना पड़ा.

वह राज मुकुट की वापसी की चिंता में रहतीं थीं. जब श्री रामजी के राजतिलक का समय आया तब दशरथ जी व कैकयी को मुकुट को लेकर चर्चा हुई. यह बात तो केवल यही दोनों जानते थे.

कैकेयी ने रघुकुल की आन को वापस लाने के लिए श्री राम के वनवास का कलंक अपने ऊपर ले लिया और श्री राम को वन भिजवाया. उन्होंने श्री राम से कहा भी था कि बाली से मुकुट
वापस लेकर आना है.

माता सीता से जुड़ा यह अनोखा राज जो श्री राम ने सिर्फ हनुमान जी को ही बताया था !

रामायण की कथा तो आप बचपन से ही सुनते और पढ़ते आ रहे है परन्तु आज हम आपको रामायण से जुडी एक ऐसी कथा के बारे में बताने जा रहे है जिस से आप शायद ही परिचित हो.

तुलसीदास द्वारा प्रभु श्री राम की कथा का वर्णन करते हुए यह बात कहि गई देवी सीता के स्वयम्बर से पूर्व भगवान श्री राम माता सीता से जनकपुर के पुष्पवाटिका में मिल चुके थे.

जनकपुर वर्तमान में नेपाल में स्थित है, भगवान श्री राम गुरु वशिष्ठ के आज्ञा से पूजा के लिए पुष्प लाने पुष्प वाटिका में पहुचे थे. ठीक उसी समय माता सीता भी पुष्प वाटिका में पहुची. माता सीता भगवान श्री राम को देखकर उन पर मोहित हो गयी भगवान श्री राम भी उन्हें देखकर आकर्षित हो गए.

उसी समय भगवान श्री राम को माता सीता ने अपने पति के रूप में चुन लिया. परन्तु तभी माता सीता को एक चिंता सताने लगी और वह यह थी की उनके विवाह के लिए पिता जनक द्वारा रखा गया शिव धनुष.

शर्त यह थी की जो भी उस शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा उसी को माता सीता वरमाला डालेगी. अगर श्री राम इस शर्त को पूरा नही कर पाए तो राम उन्हें पति के रूप में प्राप्त नही हो पाएंगे.

देवी सीता अपनी इस शंका को दूर करने के लिए अपने आराध्य माता पार्वती के पास गयी.

यदि अंगद नहीं करता मंदोदरी का अपमान तो राम के साथ युद्ध में विजयी हो जाता रावण, अनसुनी कथा !

माता सीता को रावण की कैद से मुक्त करने के लिए भगवान श्री राम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई कर दी. लंका पहुंचने से पूर्व उनके सामने एक विशाल सागर बाधा के रूप में सामने आई परन्तु श्री राम ने नल-नील की सहायता से उस विशाल सागर पर एक सेतु का निर्माण करवाया.

रावण की सेना बहुत ही विशाल एवं मायावी थी इसके साथ ही उसके पास एक से बढ़कर एक योद्धा थे. राम की सेना में भी एक से बढ़कर एक योद्धा थे उनमे से ही एक पराक्रमी योद्धा था अंगद.

अंगद वानर राज बाली का पुत्र था तथा वह अपने पिता के समान ही बलशाली एवं बुद्धिमान था.

राम एवं रावण के बीच हुए इस भयंकर युद्ध में रावण के सभी प्रमुख वीर योद्धा मारे गए, अब केवल रावण ही शेष रह गया था. तब रावण ने प्रभु राम से युद्ध में विजयी प्राप्त करने के लिए एक बहुत ही विशाल यज्ञ का आयोजन करवाया.

इस यज्ञ में रावण द्वारा विद्वान महृषियो को आमंत्रित किया गया. यहाँ तक की स्वर्ग से देवी देवताओ को इस यज्ञ को सम्पन्न करने के लिए बुलाया गया. रावण के भय से देवताओ को उस यज्ञ में सम्म्लित होना पड़ा.

देवराज इंद्र रावण की नजर से छुपते हुए प्रभु राम के पास पहुंचे तथा उन्होंने श्री राम को रावण के यज्ञ के विषय में बतलाया. तब भगवान श्री राम ने अंगद को रावण के इस यज्ञ को रोकने के लिए कुछ वानरों के साथ भेजा.

रावण को महृषियो ने यज्ञ से पूर्व यह चेतावनी दी थी की चाहे कुछ भी हो जाए उसे यज्ञ के सम्पन होने के बाद ही उठना है, अगर वह भूल से भी यज्ञ सम्पन होने से पूर्व अथवा यज्ञ के बीच में उठ जाए तो उसे यज्ञ का फल प्राप्त नहीं होगा .