माता रानी के चरण पड़े इस कुंडली पर 1 अगस्त ये राशि बन जायेगी करोड़पति

हेलो दोस्तों नमस्कार आपका मेरे चैनल पर एक बार फिर से बहुत-बहुत स्वागत है। दोस्तों आज हम इस पोस्ट में आपको बताने जा रहे हैं। उस एक भाग्यशाली राशि के बारे में जिसकी कुंडली में माता रानी के चरण पढ़ रहे हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस एक राशि के जातक की कुंडली में अचानक कुछ ऐसे बदलाव आ रहे हैं। जिससे माता रानी की कृपा इन पर बनी रहने वाली है। इसे एक राशि के लोगों की जिंदगी संवारने वाली है इन लोगों के अधूरे सपने पूरे होने का समय आ गया है। इनको बिजनेस और कारोबार में लाभ के अवसर प्राप्त होंगे आपके सभी कष्ट और परेशानी दूर होंगे बच्चों की ओर से कोई बड़ी खुशखबरी मिल सकती है। अपने दोस्तों और रिश्तेदारों का पूरा सहयोग मिलेगा आप के पक्ष में किस्मत और भाग्य रहने वाली हैं। जिससे आपको किसी बड़े कार्य में सफलता हासिल हो सकती है। कार्य क्षेत्र में लगाया गया पैसा आपको धन लाभ देगा व्यापार के नए मार्ग खुलेंगे। किसी व्यक्ति से कारोबार के सिलसिले में महत्वपूर्ण बात हो सकती है जो भविष्य में कारगर साबित होगी बेरोजगार युवाओं के लिए आने वाला समय अच्छा रहने वाला है।।

वह भाग्यशाली राशि वृषभ आज दिन की कुंडली में माता रानी के चरण पढ़ रहे हैं।

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दस नामो के जाप से शनिदेव होंगे प्रसन्न

 

शनि देव को न्याय का देवता कहा जाता हैं .वे मनुष्यो को उनके कर्मो के अनुसार शुभ अशुभ फल प्रदान करते हैं. हर व्यक्ति को जीवन में शनि की साढ़ेसाती से गुजरना पड़ता हैं. जीवन में शनि का अशुभ प्रभाव हो तो आपको मेहनत आसानी से नहीं मिलती ,आपको बहुत संघर्ष करना पड़ता हैं. शनि का अशुभ प्रभाव कम करने के लिए शनि की कृपा प्राप्त करने के लिए दान ,व्रत आदि उपाय बताये गए हैं . इनमे से एक उपाय हैं शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के पास शनि के नामो का जाप करना ,ऐसा विश्वास हैं की इन नामो का जाप करने से शनि की कृपा मिलती हैं एवं साढ़ेसाती में भी शनि का शुभ प्रभाव मिलता हैं. शनि के नाम हैं:

कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।
सौरि: शनैश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।।

इस मंत्र के अनुसार कोणस्थ, पिंगल, बभ्रु, कृष्ण, रौद्रान्तक, यम, सौरि, शनैश्चर, मंद और पिप्पलाद।
इन दस नामो का जाप करने से शनि की कृपा मिलती हैं और शनि के अशुभ प्रभाव से बचा जा सकता हैं.

 

शनिवार के दिन काले तिल जल में डालकर स्नान करे एवं पीपल के वृक्ष में जल एवं दूध अर्पित करे ,और इन दस नामो का जाप करें. इन दस नामो का जाप मंत्रो के जैसा हैं .

इस मंदिर का कलश हैं ख़ास ,कांच के दरवाजे से होते हैं शिवलिंग के दर्शन

अध्यात्म की अगर हम बात करे तो स्वयं के चैतन्य को जानना ,उसका चिंतन करना हैं. दूसरे अर्थो में कहे तो अध्यात्म का अर्थ स्वयं का आत्मचिंतन करना ही अध्यात्म हैं. अध्यात्म की दुनिया का विज्ञान से कोई सम्बन्ध नहीं.विज्ञान तथ्यों पर आधारित हैं और अध्यात्म चिंतन करना सिखाता हैं. पर अध्यात्म और विज्ञान के भेद को दूर करता हुआ सूरत के पलसाना के ऐना गांव स्थित ऋणमुक्तेश्वर महादेव का मंदिर अपने विज्ञान और अध्यात्म के लिए प्रसिद्द हैं.

इस मंदिर में 18 फ़ीट शिवलिंग के नीचे एक कलश में 4 करोड़ 55 लाख ,7 टन पारा रखा हुआ हैं. इस कलश से एक पाइपलाइन शिवलिंग के ऊपर तक लायी गयी हैं , जिससे मंदिर में ॐ का उच्चारण करने पर जो प्रतिध्वनि होती हैं उससे पारे में कम्पन पैदा होती हैं ,और भक्तो में ऊर्जा का संचार होता हैं.

 

100 वर्ष पुराने इस शिव मंदिर को एक एनआरआई ने 7 करोड़ की लागत से इसका पुनर्निर्माण कराया.18 फ़ीट उच्चे इस शिवलिंग का वजन 60 टन हैं और इस शिवलिंग पर 1008 छोटे छोटे शिवलिंग बने हुए हैं .एक कांच के दरवाजे से भक्तो को शिवलिंग के दर्शन कराये जाते हैं .कालेग्रेनाइट से इस शिवलिंग का निर्माण किया हुआ हैं .कलश से कॉपर की पाइपलाइन जो शिवलिंग के ऊपर हिस्से तक आती हैं और इसी पाइपलाइन से ॐ का उच्चारण जो पारे तक पहुँचता हैं, और फिर पूरा मंदिर ॐ की ध्वनि से गूंजता हैं.अध्यात्म और विज्ञान का ऐसा भव्य संगम शायद ही कही देखने को मिले.

भांग पीने के पीछे क्या था कारण,शिव को क्यों अर्पित की जाती हैं भांग

 

भोले बाबा का त्यौहार महाशिवरात्रि पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा हैं.सभी भक्त शिव को भांग,धतूरा ,बेलपत्र , अर्पित कर भोले बाबा को प्रसन्न करने में व्यस्त हैं,भोले बाबा को चढ़ाई जाने जाने वाली भांग भक्त भी प्रसाद समझकर ग्रहण करते हैं. इस भांग को भोले द्वारा ग्रहण क्यों किया जाता हैं ? क्या सोचा हैं कभी आपने भोले को भांग क्या इतनी पसंद थी. भांग पीने के पीछे भी एक कथा हैं.

समुद्र मंथन के समय जब समुद्र से अनेक प्रकार के रत्न ,अमृत और भी कई चीजे निकली तो साथ में हलाहल भी निकला हलाहल के बहार निकलते ही देवताओ में चिंता व्याप्त हो गयी ,इससे धरा में जनमानस का क्या होगा तब सभी देवगण शिव के पास गए और शिव की उपासना कि और हलाहल से बचने के लिए उपाय पूछा तब शिव ने हलाहल को स्वयं ग्रहण करने का निश्चय कर विष को अपने कंठ में ही रोक लिया ,इस प्रकार शिव का एक और नाम नीलकंठ पड़ा. हलाहल विष का प्रभाव जब उनके शरीर पर होने लगा तब शिव ने विष के प्रभाव को कम करने के लिए भांग का सेवन किया.

शिव और भांग के इस कथा को आधार मानते हुए शिव भक्तो में यह मान्यता हैं कि चाहे महाशिवरात्रि हो या सावन का महीना भांग को शिव का प्रसाद मानते हुए इसे ग्रहण करना चाहिए इससे शिव भक्तो का शरीर भी पवित्र हो जाता हैं.और शिव को चढ़ाये जाने वाली सामग्रियों में बेलपत्र ,धतूरा के साथ भांग का भी उतना ही महत्व हैं.इससे शिव भी प्रसन्न होते हैं.

इस एक शिवलिंग में समाहित हैं करोड़ो शिवलिंग

देवादिदेव महादेव के शिवरात्रि के पावन अवसर पर जगह जगह शिव महिमा का गुणगान सभी शिवभक्त अपने अपने तरीके से कर रहे हैं. भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए सभी शिवभक्त पूजन सामग्री भांग ,धतूरा,बेलपत्र,आदि शिव को अर्पित कर रहे हैं.और भोले की कृपा पाने के लिए मंत्रोचार से शिव का अभिषेक कर रहे हैं.

दक्षिण भारत में विशाखापट्टम में भोले बाबा को प्रसन्न करने के लिए वहाँ  एक 1 करोड़ 8 शिवलिंगो से भोले का भव्य शिवलिंग बनाया हैं. यह शिव लिंग अपने आप में एक अनूठा शिवलिंग हैं.इसे देखने के लिए जगह जगह से लोग आ रहे हैं और इस शिवलिंग के साथ सेल्फी ले रहे हैं.

अपने आप यह शिवलिंग विहंगम और मनोरम हैं.जिसे देखकर भक्त लोग आनंदित हैं.भारत में 1 करोड़ 8 शिवलिंग से बना यह शिवलिंग भव्य और अनुपम हैं .

कुल्लू में स्थित हैं अमरनाथ से ऊंचा शिवलिंग

 

देवादिदेव महादेव के मंदिरो का स्वरूप मनोरम हैं , 12 ज्योतिर्लिंग में ज्योतिर्लिंगों की महिमा न्यारी हैं, हर ज्योतिर्लिंग का अपना एक इतिहास एवं विशेषता हैं . इसी क्रम में भोले बाबा का एक मंदिर जो हिमाचल प्रदेश में कुल्लू घाटी में स्थित हैं वहाँ के अंजनी महादेव मंदिर की विशेषता ही कुछ और हैं, इस स्थान विशेष के बारे में कहा जाता हैं की यहाँ माता अंजनी ने पुत्र प्राप्ति के लिए भगवन शिव की आराधना की थी. और महादेव ने प्रसन्न होकर माता अंजनी को दर्शन दिए.

अंजनी महादेव के मंदिर को कुल्लू का छोटा अमरनाथ कहा जाता हैं. इस मंदिर की ख़ास विशेषता यहाँ का हिमशिवलिंग हैं,बर्फ़बारी के समय यह लिंगम 20 से 30 फ़ीट का हो जाता हैं ,अभी इसका आकर 40 फ़ीट का हो गया हैं,जो अमरनाथ से भी ऊंचा हैं.


यहाँ दिसम्बर से लेकर अप्रैल तक पर्यटकों की भीड़ होती हैं. हर साल दिसम्बर से शिवलिंग आकार लेना शुरू करता हैं ,और बर्फ़बारी के साथ इसका आकार बढ़ता जाता हैं.

शिव को भूलकर भी ना चढ़ाएं ये 4 चीजें, नहीं तो हो जाएंगे नाराज

भगवान शिव के दिन यानि सोमवार को अगर सच्चे मन से उनकी पूजा कि जाए तो सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। कहते हैं इनकी अराधना करने से और नियमित रूप से शिवलिंग पर जल चढ़ाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

भोले बाबा को प्रसन्न करने के लिए क्या-क्या चीजें चढ़ानी चाहिए, ये तो सभी को पता है। आज हम आपको बता रहे हैं वो ची 4 चीजें, जो भूलकर भी शिव को पूजते वक्त नहीं चढ़ानी चाहिए।

इस मंत्र के जाप से मुर्दा भी हो जाता है जिंदा, भक्तों की हर इच्छा तुरंत होती है पूरी

भारतीय शास्त्रों में महामृत्युंजय तथा गायत्री मंत्र दोनों को ही परम शक्तिशाली माना जाता है। इन दोनों मंत्रों को मिलाकर ‘मृत संजीवनी विद्या’ की रचना की गई है।

मृत संजीवनी विद्या (मंत्र) के प्रयोग से मृत व्यक्ति को भी जीवित किया जा सकता है, बड़े से बड़े रोग से भी मुक्ति पाई जा सकती है।

ऐसे करे पूजा

किसी भी शुक्ल पक्ष के सोमवार की सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान शिव की आराधना करें तथा इस मंत्र का 108 बार जप करें।
इस प्रयोग से बड़ी से बड़ी बीमारी भी सहज ही ठीक हो जाती है।

मनकामेश्वर मंदिर -इस मंदिर में स्वयं शिव जी ने की थी अपने शिवलिंग की स्थापना |

आगरा में स्थित मनकामेश्वर मंदिर उन प्राचीन मंदिरो में से एक है जो भगवन शिव को समर्पित है ये मंदिर आगरा रेलवे स्टेशन के निकट स्तिथ है मंदिर में स्तिथ भगवन शिव की शिवलिंग को चाँदी की परत से ढका गया है कहा जाता है की इस मंदिर की स्थापना भगवान् शिव ने स्वयंम की थी जब द्वापर युग में भगवान् शिव ने जन्म लिया था जब भगवान् शिव जी श्री कृष्ण जी के दर्शन के लिए हिमालय से मथुरा जा रहे थे तो उन्होंने यहाँ विश्राम किया था शिव जी ने मनकामेश्वर म तपस्या की थी और एक रात के लिए विश्राम किया था और उन्होंने कहा था की अगर में श्री कृष्ण जी को गोदी में खिलने में सफल हो जाऊंगा तो यहाँ एक शिवलिंग की स्थापना करूँगा अगले दिन जब शिवजी मथुरा गए तो यशोदा माँ ने उनका रूप देखते ही श्री कृष्ण जी से मिलने से मन कर दिया और कहा की मेरा लल्ला यानि की श्री कृष्णजी आपका ये रूप देख कर डर जाएंगे | श्री कृष्ण जी भी ठहरे नटखट उन्होंने यह दृश्य देख कर अपनी लीला प्रारम्भ कर दी और रोना शुरू कर दिया और रोते रोते उन्होंने शिव जी की तरफ इशारा किया जो बरगत के पेड़ के नीचे समाधी की अवस्था में बैठे हुए थे | कृष्ण जी को ऐसे रोटा देख माँ यशोदा ने शिव जी को बुलाया और कहा की आप मेरे पुत्र को अपना आशिर्वाद दे सकते है | गोकुल से लौटते समय शिव जी यहाँ वापस आये और अपने लिंग (शिवलिंग) स्वरुप की स्थापना की | इस तरह उन्होंने कहा की यहाँ मेरी सभी इच्छाये पूर्ण हो गयी है भविष्य में जो भी अपनी मनोकामनाये लेकर आएगा ये लिंग स्वरुप उन सभी की मनोकामनाये पूर्ण करेगा तभी से इस शिवलिंग का नाम मनकामेश्वर पड़ गया | ये मंदिर अपनेआप में बहुत अनोखा है क्योंकि यहाँ स्तिथ शिवलिंग को चांदी से ढका गया है
मनकामेश्वर मंदिर के केंद्र में एक गर्भगृह है जहाँ शिव जी की प्रतिमा को स्थापित किया गया है और साथ ही उनके पूर्ण परिवार की भी प्रतिमा है| नीचे जाने के लिए सीढ़ियां है जो भक्त स्थापित मूर्तियों का दर्शन करना चाहते है तो उन्हें इन सीढ़ियों को पर करना पड़ता है | भक्तो को और पर्यटको को भगवान् शिव की मूर्ति के समीप जाने की अनुमति है पर वो केवल एक ही शर्त पर संभव है जब पर्यटको ने कोई भी अंग्रेजी प्रकार का वस्त्र धारण नहीं किया हो और उनके पास किसी प्रकार की चमडे की वस्तु न हो और वह स्वच्छ हों |

कुछ वर्ष पूर्व २४ जुलाई २००४ को , मथुरा के श्री द्वारकाधीश मंदिर के मुखिया श्री नाना जी भाई ने इस मंदिर में कृष्ण जी के श्री नाथ जी के स्वरुप की स्थापना करवाई |
श्रीनाथ जी का स्वरुप अति मधुराष्टकं और बहुत ही अनोखा है और देखने में तो बहुत ही आकर्षक लगता है |

मुख्य गर्भगृह के पीछे कई छोटे छोटे मंदिर है जो की मुख्या मंदिर परिसर में भीतर स्तिथ है | ये सभी मंदिर भिन्न भिन्न देवी देवताओ को समर्पित है जैसे – माता गंगा , माता सरस्वती , माता गायत्री ,कैला देवी ,भगवान् रामचंद्र जी , भगवान् कृष्ण , भगवान् नरसिंह जी, भगण विष्णु जी.

इस शिवलिंग के प्रसिद्ध होने का यही मुख्य कारण है की श्री मनकामेश्वर जी के रूप में शिवजी स्वयंम भक्तो की सभी इच्छाये पूर्ण करते है | मंदिर में देसी घी से प्रज्वलित की जाने वाली ११ अखंड ज्योतियाँ २४ घंटे प्रज्वलित रहती है | इच्छा पूर्ण होने के पश्चात भक्त दुबारा मनकामेश्वर मंदिर म आते है और एक एड दीप प्रज्वलित करते है
मनकामेश्वर मंदिर में एक विशेष प्रकार का पान भी मिलता है जो केवल इसी मंदिर में पाया जाता है | इन पाँव को फोल्ड और दुबारा फोल्ड कुछ इस तरह किया जाता है कि पान देखने में एक पिरामिड जैसा लगता है फिर इन पाँव को चांदी के वरक से ढका जाता है और अंत में इस पान के ऊपर गोले का पाउडर छिड़क जाता है जो खाने के साथ साथ देखने में भी बहुत ही स्वादिष्ट लगता है |

श्री नाथ जी के दर्शन करने का समय
गर्मियों में श्रीनाथ जी के मंगल दर्शन का समय प्रातः ६;३० से ६;४५ तक है | श्रृंगार दर्शन करने का समय सुबह ८:३० से १०:३० तक है और राजभोग दर्शन करने का समय सुबह ११:३० से १२:०० बजे तक है | उत्थापन का समय ५:३० बजे से ६:३० बजे तक और संध्या दर्शन का समय शाम ७;०० से रात ९:०० बजे तक है |जबकि सर्दियों के दौरान इन समय में कुछ बदलाव क्र दिए जाते है जिनके मुताबिक सर्दियों में मंगल दर्शन करने का समय प्रातः ६:४५ से ७:०० बजे तक है | श्रृंगार दर्शन करने का समय सुबह ९:०० बजे से १०:३० बजे तक होता है | राजभोग दर्शन करने का समय १०:३० बजे से दोपहर १२:०० बझे तक होता है |उत्थापन का समय शाम ५:१५ से ६:१५ बजे तक होता है और संध्या दर्शन का समय शाम ६:४५ से ८:३० बजे तक तक होता है

मनकामेश्वर मंदिर तक कैसे पहुचें
मनकामेश्वर मंदिर आगरा रेलवे स्टेटीन के बोहोत नजदीक है | यहाँ तक पहुचने के लिए सबसे पहले ४०० मीटर तक sh 39/ah 43 दक्षिण पश्चिम में जाइये और इसके बाद बाएं दिशा में स्तिथ पार्क के साथ चलते रहें |सबसे पास वाले घुमाव पर चौथा exist लें और ६०० मीटर कि ड्राइविंग के बाद मंटोला रोड कि तरफ बायीं और जाये| मंटोला रोड पर २८० मीटर कि ड्राइविंग में बायीं तरफ से ग्लोब शेयर मार्किट को पर करने के बाद सदर भट्टी रोड पर ४०० मीटर तक चलते रहे और बाएं मुडे आपके फिर दाएं मुडे आपके सामने मनकामेश्वर मंदिर होगा |

महादेवी अक्का – देवो के देव महादेव की दीवानी – एक अनोखी कहानी

अक्का महादेवी शिव भक्त थीं। शिव को वह अपने पति के रूप में देखती थीं। बचपन से ही उन्होंने अपने आप को पूरी तरह से शिव के प्रति समर्पित कर दिया था।

जब वह युवा हुईं तो एक राजा की नजर उन पर पड़ी। वह इतनी खूबसूरत थीं कि राजा ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। राजा ने उन्हें धमकाया – अगर तुम मुझसे विवाह नहीं करोगी, तो मैं तुम्‍हारे माता पिता को मार डालूंगा। डरकर उन्होंने उससे शादी कर ली, लेकिन उसे शारीरिक रूप से दूर ही रखा।

राजा उनसे कई तरीकों से प्रेम निवेदन करता रहा, लेकिन हर बार वह एक ही बात कहतीं – मेरी शादी तो बहुत पहले शिव के साथ हो चुकी है। यह अक्का का कोई भ्रम नहीं था, यह उनके लिए शत प्रतिशत सच्ची बात थी।

राजा ने उन्हें धमकाया – अगर तुम मुझसे विवाह नहीं करोगी, तो मैं तुम्‍हारे माता पिता को मार डालूंगा। डरकर उन्होंने उससे शादी कर ली, लेकिन उसे शारीरिक रूप से दूर ही रखा।

विवाह का मतलब होता है कि आप अपना शरीर, मन, और भावनाएं अपने जीवन-साथी को सौंप देते हैं। इस संदर्भ में आज भी ऐसे बहुत से संप्रदाय हैं, जो इस तरह की

बातों को निभा रहे हैं। विधिवत ईसाई नन बनने से पहले लड़कियां जीसस से विवाह करती हैं। आखिरकार एक इंसान शरीर, दिमाग और भावनाएं ही तो है।
ऊर्जाओं का अनुभव तो इंसान को उतना नहीं हो पाता। अगर आप खुद को किसी चीज के प्रति प्रतिबद्ध करना चाहते हैं, तो शरीर, दिमाग और भावों को समर्पित किए बिना प्रतिबद्धता नहीं हो सकती। मीराबाई और ऐसे दूसरे भक्तों में यह पहलू शरीर, मस्तिष्क और भावों के भी आगे एक पूर्णत: अलग स्तर तक पहुंच गया था और पूरी तरह से वास्तविक बन गया था। आप केवल कुछ प्रसिद्ध भक्तों के बारे में जानते हैं, लेकिन ऐसे बहुत सारे भक्त हुए हैं जो गुमनाम हैं और जो इस अवस्था में पहुंच चुके थे।

अक्का महादेवी के लिए भी यह सब वास्तविक था। उनके लिए यह कोई कल्पना नहीं थी, यह शत प्रतिशत सच था।
अक्का महादेवी का यह कहना कि उनकी शादी पहले ही शिव से हो चुकी है, राजा को सहन नहीं हुआ। तो एक दिन राजा ने सोचा कि ऐसी पत्नी को रखने का कोई

मतलब नहीं है। ऐसी पत्नी के साथ भला कोई कैसे रह सकता है जिसने किसी अदृश्य व अनजाने व्यक्ति से विवाह किया हुआ है। उन दिनों औपचारिक रूप से तलाक नहीं होते थे। पर राजा परेशान रहने लगा। उसे समझ नही आ रहा था कि वह क्या करे। उसने अक्का को अपनी राजसभा में बुलाया और राजसभा से फैसला करने को कहा।

जब सभा में अक्का से पूछा गया तो वह यही कहती रहीं कि उनके पति कहीं और हैं।
राजा को गुस्सा आ गया क्योंकि इतने सारे लोगों के सामने उसकी पत्नी कह रही थी कि उसका पति कहीं और है। आठ सौ साल पहले किसी राजा के लिए यह सहन करना कोई आसान बात नहीं थी। समाज में ऐसी बातों का सामना करना आसान नहीं था। राजा ने कहा, ‘अगर तुम्‍हारा विवाह किसी और के साथ हो चुका है तो तुम मेरे साथ क्या कर रही हो? चली जाओ।’ अक्का ने कहा, ‘ठीक है’ और वहां से चल पड़ीं। भारत में उन दिनों किसी महिला के लिए यह सोचना भी दुश्वार था कि वह हमेशा के लिए अपने पति का घर छोडक़र जा सकती है, लेकिन अक्का वहां से चल पड़ीं।

अक्का जब बिना किसी परेशानी के निसंकोच राजा को छोड़ क्र जाने लगी तो राजा के मन में नीचता आ गयी और उसने अक्का से कहा की जो सब कुछ तुमने पहन रखा है कपरे गहने सब मेरा है सब कुछ यही छोड़ दो तब जाओ . लोगो से भरी राज्यसभा में उस अठ्ठारह वर्ष की युवती अक्का महादेवी ने अपने गहने यहाँ तक की वस्त्र भी उत्तर दिए और निर्वस्त्र ही वह से चल दी|

उस दिन के बाद से उन्होंने वस्त्र पहनने से इनकार कर दिया |बोहोत लोगो ने उन्हें समझने की कोशिश की के उन्हें वस्त्र पहनने चाहिए वह एक स्त्री है इससे उन्हें परेशानी हो सकती है लेकिन उन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जीवन भर वह निर्वस्त्र ही रहीं | महादेवी अक्का की मृत्यु कम उम्र में ही हो गया था

लेकिन उन्होंने बहुत ही छोटे जीवन काल में शिव और उनके प्रति अपनी भक्ति पर बहुत सी खूबसूरत कवितायेँ लिखीं

वह अपने प्रभु से हमेशा यही कहती थी कि हे शिव मुझे आज भोजन न मिले क्योंकि में आपमें समाहित होने के लिए जिस तरह तड़प से गुजर रहीं हु वह तड़प और पीड़ा मेरे शरीर हो भी महसूस हो| और यदि मैं भोजन के लुंगी तो मेरा शरीर संतुष्ट हो जाएगा और मेरा शरीर कैसे जानेगा कि मैं क्या महसूस क्र रहीं हूँ इसलिए मैं चाहती हूं कि मुझे भोजन ही न मिले। अगर मेरे हाथ में भोजन आए भी तो इससे पहले कि मैं उसे खाऊं, वह जमीन पर गिर जाए। अगर यह जमीन पर गिर गया तो मेरे जैसी मूर्ख उसे उठाकर खा सकती है इसलिए इससे पहले कि गिरे हुए भोजन को मैं उठाकर खाऊं, कोई कुत्ता आए और उसे ले जाए।” यह उनकी रोजाना की प्रार्थना थी।
भक्त पूरी तरह से अलग प्राणी होते हैं। एक सच्चा भक्त सामाजिक ताने-बाने में फिट नहीं बैठता, इसलिए ऐसे लोग हमेशा समाज से अलग रहते हैं।

कुछ भक्त अपने अलग तौर-तरीकों के बावजूद भी किसी तरह समाज में स्वीकार कर लिए जाते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग गुमनामी में कहीं खो जाते हैं या कई बार ऐसा भी होता है कि उन्हें मार दिया जाता है। कई दूसरी सभ्‍यताओं और देशों में ऐसे लोगों की हत्या कर दी जाती है, लेकिन भारत में कम से कम ऐसा नहीं होता। भक्त इस दुनिया के नहीं होते, उनका केवल भौतिक शरीर यहां होता है। उनके जीने का तरीका और वह शक्ति, जो उनके पास होती है, पूरी तरह से किसी दूसरे लोक की होती है।