आपकी हर बात मानेगा आपके सामने खड़ा व्यक्ति सिर्फ इस माला को पहनते ही खुद सफलता आएगी पीछे पीछे

जिस इंसान का सूर्य बलवान होता है उसकी एक अलग ही पहचान होती है. वह कहीं भी होता है उसके अलग से चर्चे होते हैं. उसके चेहरे में सूर्य के समान चमक होती है. तथा उसमें इतना आकर्षण होता है वह जो भी कहता है लोग उसकी बात आसानी से मानते हैं.

ऐसे व्यक्ति को बहुत ज्यादा मान सम्मान समाज में प्राप्त होता है. यही कारण है व्यक्ति के जीवन में सूर्य ग्रह का मजबूत होना आवश्यक है. यदि सूर्य ग्रह मजबूत होगा तो आप ज्यादा सफलता और ऊंचाइयां प्राप्त कर पाएंगे. सूर्य ग्रह मजबूत होने से व्यक्ति का भाग्य तो प्रबल होता ही है इसके साथ ही साथ उस व्यक्ति के चेहरे और उसके व्यक्तित्व पर जो निखार होता है हर कोई उसके आकर्षण में फस जाता है .

सिर्फ वह व्यक्ति जो कुछ भी कहता है हर कोई उसकी बात मानने लगता है. यदि आप धन से संबंधित अथवा नौकरी से संबंधित किसी समस्या से परेशान रहते हैं और इससे बचना चाहते हैं तो सूर्य ग्रह का बलवान होना आपके भाग्य के लिए बहुत आवश्यक है. इसीलिए दोस्तों अपनी कुंडली में सूर्य ग्रह को मजबूत करने के लिए आप इस सिद्ध सूर्य लॉकेट को गले में पहने. यह सिद्ध सूर्य लॉकेट भगवान सूर्य देव का साक्षात् प्रतीक होने के साथ ही साथ इसमें महादेव शिव का आशीर्वाद पंच मुखी रुद्राक्ष भी स्थापित है जो इसकी शक्ति को कई गुना बढ़ा देता है. इस लाकेट के ठीक बीचो बिच दिव्य गुप्त मन्त्र अंकित है जो नक्षत्रो को आपके अनुकूल बनाता है तथा आपके किसी भी कार्य में सफलता प्राप्ति करने की संभावना को बढ़ा देता है. यानी की आपको हार हाल में आपके काम में सफलता मिलेगी.

इसको धारण करने के बाद से ही व्यक्ति के चेहरे में एक अलग सा तेज उतपन्न हो जाता है जिसके आकर्षण से समाने खड़ा व्यक्ति भी उसकी हर बात मानने को तैयार हो जाता है. यह आपके कॉन्फिडेंस लेवल को इतना बढ़ा देता है की नौकरी, परीक्षा, व्यापार हर क्षेत्र में आप को सफलता प्राप्त करना बहुत आसान सा हो जाता है.

दोस्तों एक बात का ध्यान रखे इस सिद्ध सूर्य लाकेट को आप ऐसे ही धारण न करे. रविवार को सुबह जल्दी उठ आप पहले स्नान आदि कर सुद्ध हो जाए. अब आप इस लॉकेट को एक ताम्बे के लोटे में जिसमे गंगा जल मिला हुआ पानी हो उसमे डाल दे. अब भगवान सूर्य का ध्यान करते हुए आप निम्न मन्त्र का 11 बार जप करे. मन्त्र है दोस्तों ॐ सूर्याय नमः. अब आप इस सिद्ध सूर्य लाकेट को धारण कर सकते है. दोस्तों सिद्ध सूर्य लाकेट को यदि आप खरीदना चाहते है तो इसका लिंक हमने निचे दिया है.

सिद्ध सूर्य कवच

विनायक चतुर्थी- विनायकी चतुर्थी : बप्पा के पूजन की आसान विधि, शीघ्र होंगे प्रसन्न

हिन्दू पंचांग में हर एक चन्द्र महीने में दो चतुर्थी तिथि होती है। पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है तथा अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। भारत के उत्तरी एवं दक्षिणी राज्यों में संकष्टी चतुर्थी का त्यौहार मनाया जाता है। संकष्टी शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है जिसका मतलब होता है ‘कठिन समय से मुक्ति पाना’ ।

साल 2018 के लिए विनायक चतुर्थी की सूची
21 जनवरी (रविवार) विनायक चतुर्थी
19 फरवरी (सोमवार) विनायक चतुर्थी
21 मार्च (बुधवार) विनायक चतुर्थी
19 अप्रैल (गुरुवार) विनायक चतुर्थी
18 मई (शुक्रवार) विनायक चतुर्थी
17 जून (रविवार) विनायक चतुर्थी
16 जुलाई (सोमवार) विनायक चतुर्थी
14 अगस्त (मंगलवार) विनायक चतुर्थी
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश को सभी देवताओं में प्रथम पूजनीय माना जाता है। मान्यता है कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले भगवान गणेश का पूजन करने से सभी परेशानियां खत्म हो जाती है, इसी कारण से उन्हें संकटमोचन और विघ्नहर्ता कहा जाता है। मान्यता है कि चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा और व्रत फलदायी होता है। हिंदू पंचाग के अनुसार हर माह में दो बार चतुर्थी का व्रत आता है और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन भगवान गणेश के पूजन से विशेष लाभ की प्राप्ति होती है।


विनायक चतुर्थी को वरद चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। वरद का अर्थ होता है भगवान से किसी भी इच्छा को पूरा करने के लिए प्रार्थना करना। माना जाता है कि जो इस दिन उपवास का पालन करते हैं उन भक्तों को भगवान गणेश ज्ञान और धैर्य के साथ आशीर्वाद देते हैं। बुद्धि और धैर्य दो ऐसे गुण हैं जिनके महत्व को मानव जाति युगों से पहचान बनाए हुए है। जो इन गुणों को पाने की चाहत रखते हैं वो जीवन में प्रगति करता है। विनायक चतुर्थी का पूजन दिन के मध्य में किया जाता है जिसे हिंदू पंचाग के अनुसार मध्यान्ह कहा जाता है। इस दिन संतान की इच्छा रखने वाली महिलाएं व्रत करती हैं।
13 सितम्बर (गुरुवार) विनायक चतुर्थी
12 अक्तूबर (शुक्रवार) विनायक चतुर्थी
11 नवम्बर (रविवार) विनायक चतुर्थी
11 दिसम्बर (मंगलवार) विनायक चतुर्थी
गणेश पूजा के लिए वैसे तो हर दिन ही उत्तम एवं शुभ माना जाता है, किंतु यदि आप लंबे समय से किसी समस्या से पीड़ित हैं तो विनायकी चतुर्थी का व्रत सबसे उत्तम माना गया है। इसे संकटा एवं विनायकी चतुर्थी भी कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष के अनुसार कहा जाता है। इस माह विनायकी चतुर्थी व्रत सोमवार 19 फरवरी 2018 को है।

महाराष्ट्र और तमिल नाडु में व्रत अधिक प्रचलित

पश्चिमी और दक्षिणी भारत में और विशेष रूप से महाराष्ट्र और तमिल नाडु में संकष्टी चतुर्थी का व्रत अधिक प्रचलित है।प्रत्येक चन्द्र मास में दो चतुर्थी होती हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी।

बेहद कठोर होता है यह व्रत

विनायकी, संकष्टी चतुर्थी का यह व्रत बेहद कठोर होता है इस व्रत में केवल फलों एवं जड़ों अर्थात जमीन के अन्दर पौधों का भाग सहित वनस्पति और उत्पादों आदि का ही सेवन किया जाता है बप्पा के इस व्रत के दौरान साबूदाना खिचड़ी के अलावा आलू, मूंगफली का मुख्य रूप से सेवन किया जाता है। इस व्रत की खासियत यह है कि श्रद्धालु चन्द्रमा दर्शन करने के उपरांत ही उपवास खोलते हैं।

भक्ताें को सद्मार्ग की आेर ले जाते हैं बप्पा

ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त पूरे विधि-विधान एवं निष्ठा से इस व्रत को धारण करते हैं उसकी मनोकामनाएं अवश्य ही पूर्ण होती हैं। जीवन के अनेक कष्टों से उसे राहत मिलती है साथ ही आने वाले संकट का एहसास भी उसे पूर्व में ही हो जाता है। बप्पा अपने भक्तों पर अवश्य ही कृपा करते हैं और बुद्धिबल में विकास के साथ ही उसे सद्मार्ग की ओर ले जाते हैं। इस व्रत का विधान लगभग पूरे भारत में देखने मिलता है। गणपति को प्रसन्न करने ये बहुत ही उत्तम दिन माना गया है।
विनायक चतुर्थी उपवास

देवी-देवताओं में सर्वप्रथम पूज्‍यनीय भगवान गणेश की पूजा हमेशा ही होती है लेकिन विनायक चतुर्थी का दिन ज्‍यादा शुभ होता है। हिन्दु कैलेण्डर के मुताबिक अमावस्या के बाद की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। विनायक चतुर्थी के दिन उपवास भी रखा जाता है। हालांक‍ि जो लोग पूर दिन व्रत रखने में असमर्थ हैं वह गणेश जी की पूजा के बाद अन्‍न ग्रहण कर सकते हैं।

ऐसे करते हैं गणेश पूजन

विनायक चतुर्थी के दिन दोपहर को मध्याह्न काल में पूजा करना शुभ माना जाता है। इस द‍िन सुबह उठकर स्‍नान आद‍ि करें। इसके बाद गणेश जी के सामने हाथ जोड़कर व‍िनायक चतुर्थी का व्रत करने का संकल्‍प लें। इसके बाद मध्याह्न काल में एक पाटे पर लाल कपड़ा ब‍िछाकर गणेश जी छोटी प्रत‍िमा को स्‍थापित करें। इसके बाद कलश स्‍थाप‍ित कर व‍िध‍िव‍िधान से उनकी पूजा करें व कथा पढ़ें। गणेश जी को मोदक का भोग लगाकर आरती आदि करें।
वरद व‍िनायक चतुर्थी भी कहते:

व‍िध्‍नहरण मंगलकरण यानि‍ क‍ी विघ्नों का नाश करने के लिए लोग गणपति की उपासना करते हैं। वैसे तो गणेश जी की पूजा हर द‍िन और सबसे पहले होती है, लेक‍िन व‍िनायक चतु‍र्थी का द‍िन भक्‍तों के ल‍िए खास होता है। चतुर्थी तिथि भगवान गणेश की तिथि मानी जाती है। हर माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। ऐसे में कल 29 मई सोमवार को व‍िनायक चतुर्थी पर सिद्धि विनायक श्री गणेश जी का व्रत रखा जाएगा। विनायक चतुर्थी को वरद विनायक चतुर्थी भी कहते हैं।

पूजा दोपहर को मध्याह्न काल में:

ह‍िंदू कैलेण्डर के विनायक चतुर्थी के दिन गणेश जी की पूजा दोपहर को मध्याह्न काल में शुभ मानी जाती है। ह‍िंदू शास्‍त्रों के मुताबकि व‍िनायक चतुर्थी का व्रत पूरे द‍िन स्‍वच्‍छ मन से रखना चाह‍िए। हालांक‍ि जो लोग व्रत रखने में असमर्थ हैं वह गणेश जी की पूजा के बाद अन्‍न ग्रहण कर सकते हैं। इस द‍िन सुबह उठकर स्‍नान आद‍ि करें। इसके बाद गण्‍ोश जी के सामने हाथ जोड़कर व‍िनायक चतुर्थी का व्रत करने का संकल्‍प लें। फ‍िर दोपहर को मध्याह्न काल एक पाटे पर लाल कपड़ा ब‍िछाकर उस पर गणेश जी छोटी प्रत‍िमा या फ‍िर कैलेंडर आद‍ि रखें। इसके बाद कलश स्‍थाप‍ित कर व‍िध‍िव‍िधान से उनकी पूजा करें व कथा पढ़ें। आरती कर पूजा समाप्‍त करें।
प्रसाद में मोदक भोग जरूर लगाएं:

गणेश जी के सामने प्रसाद में मोदक का भोग जरूर लगाएं। मान्‍यता है क‍ि अगर गणपति पूजा में मोदक का भोग नहीं लगाया तो वह व्रत व पूजा अधूरे माने जाते हैं। गणेश जी को मोदक बहुत पसंद हैं। व‍िनायक चतुर्थी का व्रत रखने वाले को इस खास द‍िन पर गणेश जी के इन 10 नामों को पढ़ते हुए 21 दुर्वा उन पर चढ़ानी चाहि‍ए। ॐ गणाधिपाय नम, ॐ उमापुत्राय नम, ॐ विघ्ननाशनाय नम, ॐ विनायकाय नम, ॐ ईशपुत्राय नम, ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नम, ॐ एकदंताय नम, ॐ इभवक्ताय नम, ॐ मूषकवाहनाय नम,ॐ कुमारगुरवे नम। इससे गणेश जी अपने भक्‍तों पर प्रसन्‍न उनकी हर बाधा को दूर करते हैं। उनकी हर मनोकामना पूर्ण करते हैं।

परशुराम जयंती | Parshuram Jayanti | Akshaya Tritiya | Parshuram Jayanti 2018

वर्ष 2018 में 18 अप्रैल , वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को परशुराम जयन्ती मनाई जाएगी. वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की रात में पहले प्रहर में भगवान परशुराम का जन्म हुआ था. इसलिए यह जयन्ती तृतीया तिथि के प्रथम प्रहर में मनाई जाती है.

राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र,परशुराम जी भगवान विष्णु के अवतार थे. परशुराम भगवान शिव के अनन्य भक्त थे. वह एक परम ज्ञानी तथा महान योद्धा थे इन्ही के जन्म दिवस को परशुराम जयंती के रूप में संपूर्ण भारत में बहुत हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है. भगवान परशुराम जयंती के अवसर पर देश भर में हवन, पूजन, भोग एवं भंडारे का आयोजन किया जाता है तथा परशुराम जी शोभा यात्रा निकली जाती है. विष्णु के अवतार परशुराम जी का पूर्व नाम तो राम था, परंतु को भगवान शिव से प्राप्त अमोघ दिव्य शस्त्र परशु को धारण करने के कारण यह परशुराम कहलाए.

भगवान विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार के रूप में अवतरित हुए थे धर्म ग्रंथों के आधार पर परशुराम जी का जन्म अक्षय तृतीया, वैशाख शुक्लतृतीया को हुआ था जिसे परशुराम जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन व्रत करने और पर्व मनाने की प्रथा प्राचीन काल से ही चली आ रही है. परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था. परशुराम ने शस्त्र विद्या द्रोणाचार्य से सीखी थी.


भगवान परशुराम जयंती महत्व | Significance of Parshuram Jayanti
वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि त्रेतायुग आरम्भ की तिथि मानी जाती है और इसे अक्षय तृतीया भी कहते है इसी दिन भगवान परशुराम जी का जन्म हुआ था. भागवत अनुसार हैहयवंश राजाओं के निग्रह के लिए अक्षय तृतीया के दिन जन्म परशुराम जी का जन्म हुआ. जमदग्नि व रेणुका की पांचवी सन्तान रूप में परशुराम जी पृथ्वी पर अवतरीत होते हैं इनके चार बड़े भाई रूमण्वन्त, सुषेण, विश्व और विश्वावसु थे अक्षय तृतीया को भगवान श्री परशुराम जी का अवतार हुआ था जिस कारण यह परशुराम जयंती के नाम से विख्यात है.

भगवान परशुराम जी शास्त्र एवम् शस्त्र विद्या के ज्ञाता थे. प्राणी मात्र का हित ही उनका सर्वोपरि लक्ष्य रहा. परशुराम जी तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरूष रहे. परशुराम जी अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे उन्होंने दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की हर प्रकार से रक्षा व सहायता की. भगवान परशुराम जी की जयंती की अक्षततिथि तृतीया का भी अपना एक अलग महत्त्व है. इस तारीख को किया गया कोई भी शुभ कार्य फलदायक होता है. अक्षत तृतीया तिथि को शुभ तिथि माना जाता है इस तिथि में बिना योग निकाले भी कार्य होते हैं. भगवान परशुराम की जयंती हिंदू धर्मावलंबियों द्वारा बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है. प्राचीन ग्रंथों में इनका चरित्र अलौकिक लगता है. महर्षि परशुराम उनका वास्तविक नाम तो राम ही था जिस वजह से यह भी कहा जाता है कि ‘राम से पहले भी राम हुए हैं’.

परशुराम जन्म कथा । Parshuram Birth Story
भगवान परशुराम के जन्म के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं। हरिवंशपुराण के अनुसार उन्हीं में से एक कथा इस प्रकार है-

पोराणिक काल में महिष्मती नगरी पर हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य अर्जुन(सहस्त्रबाहु) का शासन था. वह बहुत अत्याचारी शासक था. जब क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार बहुत बढ़ गया तो पृथ्वी माता, भगवान विष्णु के पास गई और अत्याचारियों का नाश करने का आग्रह किया तब भगवान विष्णु ने उन्हें पृथ्वी को वचन दिया कि वह धर्म की स्थापना के लिए महर्षि जमदग्नि के पुत्र में रूप में अवतार लेकर अत्याचारियों का सर्वनाश करेंगे इस प्रकार भगवान, परशुराम रूप में जन्म लेते हैं और पृथ्वी पर से पापियों का नाश कर देते हैं.

परशुराम ने कार्त्तवीर्य अर्जुन का वध कर दिया इसके बाद उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया और उनके रक्‍त से समन्तपंचक क्षेत्र में पाँच सरोवर भर दिये थे. अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका और तब परशुराम जी ने कश्यप ऋषि को पृथ्वी का दान कर दिया और स्वयं महेन्द्र पर्वत पर निवास करने लगते हैं

शंकराचार्य जयंती 2018 – आदि शंकराचार्य

शंकराचार्य जयंती 2018 – आदि शंकराचार्य जिन्होंने हिंदू धर्म को दी एक नई चेतना
वैशाख मास का हिंदू धर्म में बहुत महत्व है। इस माह में अनेक धार्मिक गुरुओं, संत कवियों सहित स्वयं भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में अवतार धारण किया। वैशाख कृष्ण एकादशी वल्लाभाचार्य तो शुक्ल तृतीया जिसे अक्षय तृतीया कहते हैं कि दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ। इसी कड़ी में वैशाख शुक्ल पंचमी भी बहुत ही भाग्यशाली तिथि है। इसी दिन श्री नाथ जी के परम भक्त संत महाकवि सूरदास का जन्म हुआ तो यही दिन हिंदू धर्म की ध्वजा को देश के चारों कौनों तक पंहुचाने वाले, अद्वैत वेदांत के मत को शास्त्रार्थ द्वारा देश के हर कौने में सिद्ध करने वाले, भगवान शिव के अवतार माने जाने वाले आदि शंकराचार्य ने जन्म लिया। वैशाख शुक्ल पंचमी अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार वर्ष 2017 में 20 अप्रैल को है। आइये शंकाराचार्य जयंती के अवसर पर जानते हैं आदि शंकराचार्य की जीवनी और उनके प्रयासों से हिंदू धर्म को मिली एक नई चेतना के बारे में।

आदि शंकाराचार्य संक्षिप्त जीवन परिचय
आदि शंकराचार्य एक ऐसे धर्मगुरु माने जाते हैं जिन्होंनें हिंदू धर्म की पुन:स्थापना की। जिन्होंने अद्वैत वेदांत मत का प्रचार किया। देश के चारों कौनों में शक्तिपीठों की स्थापना कर हिंदू धर्म की ध्वज़ा दुनिया भर में फहराई। उनका जीवन काल भले ही छोटा रहा हो लेकिन उनके जीवन एवं विचारों ने भारतीय धर्म दर्शन को एक नई चेतना प्राप्त की। इनका जन्म 788 ई.पू. माना जाता है। केरल का कालड़ी जो उस समय मालाबार प्रांत में होता था नामक स्थान पर एक नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में आदि शंकराचार्य का जन्म माना जाता है। इनके जन्म की कथा कुछ इस प्रकार बताई जाती है।

वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन दक्षिण के कालाड़ी ग्राम में शिवगुरु नाम के एक ब्राह्मण निवास करते थे। विवाह होने के कई सालों बाद भी उनके यहां कोई संतान नहीं हुई। शिवगुरु ने पत्नी विशिष्टादेवी के साथ संतान प्राप्ति हेतु भगवान शंकर की आराधना की। इनके कठिन तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्वप्न में दर्शन दिये और वर मांगने को कहा। तब शिवगुरु ने भगवान शिव से एक ऐसी संतान की कामना की जो दीर्घायु भी हो और जिसकी ख्याति विश्व भर में हो जो सर्वज्ञ बनें। तब भगवान शिव ने कहा कि या तो तुम्हारी संतान दीर्घायु हो सकती है या फिर सर्वज्ञ, जो दीर्घायु होगा वो सर्वज्ञ नहीं होगा और अगर सर्वज्ञ संतान चाहते हो तो वह दीर्घायु नहीं होगी। तब शिवगुरु ने दीर्घायु की बजाय सर्वज्ञ संतान की कामना की। कहा जाता है कि भगवान शिव ने फिर स्वयं शिवगुरु की संतान के रूप में जन्म लेने का वर दिया।

इसके पश्चात समय आने पर शिवगुरु और विशिष्टादेवी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। भगवान शंकर की तपस्या के प्रताप इस बालक का नाम भी माता-पिता ने शंकर रखा। कहते हैं पूत के पांव पलने में ही नज़र आने लगते हैं फिर वे तो स्वयं भगवान शंकर का वरदान थे अत: शैशव काल में ही यह संकेत तो माता-पिता को दिखाई देने लगे थे कि यह बालक तेजस्वी है, सामान्य बालकों की तरह नहीं है। हालांकि शैशवकाल में ही पिता शिवगुरु का साया सर से उठ गया। बालक शंकर ने भी माता की आज्ञा से वैराग्य का रास्ता अपनाया और सत्य की खोज में चल पड़े। मान्यता है कि मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें वेदों का संपूर्ण ज्ञान हो गया था। बारह वर्ष की आयु तक आते-आते वे शास्त्रों के ज्ञाता हो चुके थे। सोलह वर्ष की अवस्था में तो आप ब्रह्मसूत्र भाष्य सहित सौ से भी अधिक ग्रंथों की रचना कर चुके थे। इस आप शिष्यों को भी शिक्षित करने लगे थे। इसी कारण आपको आदि गुरु शंकाराचार्य के रूप में भी प्रसिद्धि मिली।

शंकराचार्य पीठों की स्थापना (SHANKARACHARAY PEETH)
देश के चारों कौनों में अद्वैत वेदांत मत का प्रचार करने के साथ ही आपने पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओं में मठों की स्थापना की इन्हें पीठ भी कहा जाता है।

वेदांत मठ – दक्षिण भारत में आपने वेदांत मठ की स्थापना श्रंगेरी (रामेश्वरम) में की। यह आप द्वारा स्थापित प्रथम मठ था इसे ज्ञानमठ भी कहा जाता है।

गोवर्धन मठ – इसे आपने पूर्वी भारत (जगन्नाथपुरी) में स्थापित किया। यह आदि शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित दूसरा मठ था।

शारदा मठ – पश्चिम भारत (द्वारकापुरी) में आपने तीसरे मठ की स्थापना की इसे कलिका मठ भी कहा जाता है।

बद्रीकाश्रम – इसे ज्योतिपीठ मठ कहा जाता है। यह आप द्वारा उत्तर भारत में स्थापित किया गया।

इस प्रकार चारों दिशाओं में मठों की स्थापना कर आपने धर्म का प्रचार पूरे देश में किया। आप जहां भी जाते वहां शास्त्रार्थ कर लोगों को उचित दृष्टांतों के माध्यम से तर्कपूर्ण विचार प्रकट कर अपने विचारों को सिद्ध करते। आपने तत्कालीन विद्वान मिथिला के मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित किया लेकिन कहा जाता है कि मण्डन मिश्र की पत्नी भारती ने आपको शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया। आपने पुन: रतिज्ञान प्राप्त किया और तत्पश्चात उन्हें भी शास्त्रार्थ में पराजित किया।

आदि शंकराचार्य जी के अनमोल विचार – (SHANKARACHARYA VALUABLE THOUGHTS)
आपने देश भर में भ्रमण कर देश की सभ्यता, संस्कृति, जन-जीवन को तो समझा ही साथ ही मानवता के कल्याण के लिये देश की बेहतरी के लिये देश में मौजूद विविधताओं का सम्मान करते हुए एक नई राह लोगों को दिखाकर उनका मार्ग दर्शन किया। भारतीय जीवन दर्शन को समझने की एक नई दृष्टि आदि शंकराचार्य जी ने अपनी अल्पायु में दी। आपके कुछ अनमोल विचार इस प्रकार हैं –

आपका मानना था कि स्वच्छ मन सबसे बड़ा तीर्थ है। यदि व्यक्ति अपने मन की शुद्धि कर ले तो उसे कहीं बाहर तीर्थ आदि पर जाने की आवश्यकता नहीं है।

आपका मानना था आत्मा स्वयं ज्ञान का स्वरूप है इसे किसी अतिरिक्त ज्ञान की आवश्यकता नहीं है जिस तरह जलते हुए दीपक को अन्य रोशनी के लिये अन्य दीप की आवश्यकता नहीं होती।

आपने संदेश दिया कि यह संसार एक स्वपन की तरह है जो मोह-माया से भरा पड़ा है जैसे ही हमारी अज्ञान रूपी निद्रा टूटती और ज्ञान रूपी प्रकाश हमें मिलता है उसी समय हम इस स्वप्न के सार को समझ जाते हैं।

आपने सत्य के बारे में बताया है कि जो सदा से था, सदा से है और सर्वदा रहेगा वही एकमात्र सत्य है।

गर्भवती महिलाओं के लिए श्राप है कॉफी का सेवन, भूलकर भी ना पीएं

गर्भवती महिलाएं कॉफी पिएं या नहीं, इसे लेकर डॉक्टरों के भी अलग-अलग विचार हैं। लंबे समय से यह धारणा चली आ रही है कि गर्भावस्था के दौरान प्रतिदिन दो कप कॉफी पीने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन एक हालिया रिसर्च ने इस दावे को पीछे धकेल दिया है। इस रिसर्च के मुताबिक दो कप काफी का मतलब है गर्भपात के खतरे को दोगुना बढ़ा देना। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रतिदिन 300 मिलीग्राम तक कॉफी का सेवन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक नहीं है लेकिन स्वीडन में हुए एक शोध के नतीजे इस बात को सिरे से नकारते हैं। स्वीडन के सल्ग्रेन्सका विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान अगर कोई महिला दिन में 100 ग्राम कैफीन का भी सेवन करती है तो उसके शिशु का वजन 21 से 28 ग्राम तक घट सकता है।

गर्भावस्‍था के पहले हफ्ते हो सकती है मितली की समस्‍या

आमतौर पर किसी नवजात बच्चे का आदर्श वजन 3.6 किलोग्राम होता है। शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि कैफीन के सेवन से न सिर्फ बच्चों के वजन बल्कि उनकी लंबाई पर भी प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि अभी तक इस बारे में वे कोई तथ्य नहीं जुटा पाए हैं। पूर्व के अध्ययनों में भी बताया गया था कि कॉफी में मौजूद कैफीन गर्भपात के खतरे को बढ़ा देता है। लेकिन यह निष्कर्ष कैफीन की ज्यादा मात्रा पर आधारित था। इसे लेकर विवाद भी काफी रहा। अन्य शोधकर्ताओं का मानना था कि इस अध्ययन में गर्भवती महिलाओं को सुबह-सुबह पेश आने वाली परेशानियों को नजरअंदाज किया गया है।

प्रेग्‍नेंसी कैलेंडर की मदद से जानें बच्‍चे की ग्रोथ का हाल
हार्मोन का स्तर बढ़े होने से सुबह जी मिचलाने या उल्टी होने को आम तौर पर गर्भपात के खतरे को कम करने वाला माना जाता है। काफी पीने से ये लक्षण दूर हो सकते हैं। इसलिए भी गर्भवती महिलाओं को सुबह में काफी या कैफीन से जुड़े अन्य पेय पदार्थो से परहेज करना चाहिए। इस मुद्दे की तह तक जाने के लिए आकलैंड के डा. डी-कुन लीके नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक टीम ने अध्ययन को अंजाम दिया। इसमें पहली बार सुबह की दिक्कतों को भी ध्यान में रखा गया। डा. ली की टीम इस नतीजे पर पहुंची कि प्रतिदिन 200 मिलीग्राम कैफीन पीने से गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है। 200 मिलीग्राम कैफीन का मतलब दो कप काफी।

घर पर लगा है ये पौधा और आपको नहीं पता पौधे से जुडी ये 1 बात तो तबाह हो सकती है आपकी ख़ुशी

जन्तु और वनस्पतियां एक दूसरे से बहुत घनिष्ठ रूप से जुड़े हुये हैं। कालक्रम में कुछ वनस्पतियां बहतु उपयोगी पाई गई हैं। इनके प्रय़ोग से जीवन में मनचाही तरक्की पाई जा सकती है। ऐसे ही कुछ पेड़ों में से एक अशोक का पेड़ है।

अशोक का अर्थ होता है- जहां पर शोक न हो, यानी अशोक का पेड़ जहां पर होता है, वहां शोक, दुःख, अशांति अपनी जगह नहीं बना सकते। इसके बजाय उस जगह पर सुख-शांति और बनी रहती है। भगवान श्रीराम ने भी इसे शोक दूर करने वाले पेड़ की उपमा दी है।

कामदेव के पंच पुष्प बाणों में से एक अशोक भी है। भारत में धार्मिक या मांगलिक कार्यों के लिये भी अशोक के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। जानिए कैसे आपके बिजनेस में लगातार हो रही धन की हानि दूर होगी और आपके व्यापार की गति बढ़ेगी। कैसे समाज में आपका मान-सम्मान और ऐश्वर्य बढ़ेगा। कैसे आपके काम की सफलता सुनिश्चित होगी। कैसे आपको मंगल के दोषों से मुक्ति मिलेगी और कैसे आपकी बेटी के विवाह में आ रही परेशानियां दूर होंगी

बिजनेस में हानि
अगर आपके बिजनेस में दिन-प्रतिदिन धन की हानि हो रही है और आपका व्यापार बन्द होने की कगार पर है तो अशोक के पेड़ के सात पत्तों को लाकर, उन्हें साफ पानी से धोकर धूप दिखाएं और आंखें बन्द करके अपनी समस्या के निवारण के लिये प्रार्थना करें। अब इन पत्तों को जहां आप पैसे रखते हों, उस स्थान पर रख दें। चौबीस घंटे बाद इन पत्तों को जल में प्रवाहित कर दें। इससे आपके बिजनेस में जल्दी ही वृद्धि होने लगेगी और आपके बिजनेस की गाडी पटरी पर तेजी से दौड़ने लगेगी।

धनलाभ के लिए
घर में पैसों की स्थिति को मजबूत बनाने के लिये किसी शुभ मुहुर्त में अशोक के पेड़ की जड़ को निमन्त्रण देकर ले आयें। जड़ को घर लाते समय मौन रहें। घर में लाकर जड़ को पहले गंगाजल से शुद्ध कर लें, फिर उस जड़ को तिजोरी या जहां भी आप पैसे रखते हों, वहां पर रख लें। इस उपाय से आपके घर में धन की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ होगी।

खुश-शांति के लिए
घर में सुख-शांति और समृद्धि बनाए रखने के लिये अशोक के वृक्ष को घर में लगाएं और प्रतिदिन उसकी जड़ में पानी डालें।

सफलता प्राप्त करने के लिए
अगर आप किसी काम को करने के लिए बहुत प्रयासरत हैं, लेकिन आपको सफलता नहीं मिल पा रही है तो आप पुष्य नक्षत्र में अशोक के पेड़ के 11 बीज लेकर उसे एक चांदी के ताबीज में डालकर धारण कर लें। आपको धीरे-धीरे करके हर काम में सफलता मिलने लगेगी।

वास्तु दोषों से निजात पाने के लिए
अशोक का पेड़ वास्तु दोषों से छुटकारा पाने के लिये और घर की निगेटिविटी को दूर करने में भी सहायक है। जिस घर में अशोक का पेड़ लगा होता है, वहां किसी प्रकार की निगेटिव एनर्जी नहीं टिकती और न ही किसी भी प्रकार का भय रहता है। अशोक का पेड़ लगाने के साथ ही शाम के समय पेड़ के नीचे घी और कपूर का दीपक जलाना चाहिए। अशोक के पेड़ को घर की दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा में लगाने से ज्यादा पॉजिटिव रिजल्ट मिलते हैं।

हर काम में सफलता के लिए
अगर आप किसी ऐसे काम को करने जा रहे हैं जो आपके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, तो उस काम की सफलता सुनिश्चित करने के लिये अशोक के वृक्ष का एक पत्ता लें और उसे अपने सिर पर रख लें। पत्ता उड न जाये, इसके लिये अपने सिर पर टोपी पहन लें, आपका कार्य अवश्य सफल होगा।

मंगल पीड़ा से निजात दिलाने के लिए
अशोक के पेड़ से मंगल ग्रह की पीड़ा से भी मुक्ति मिलती है। अगर आप भी मंगल के दोषों से पीड़ित हैं तो मंगलवार के दिन हनुमान जी को पांच अशोक के पत्ते चढ़ाएं। आपको जल्दी ही राहत मिलेगी।

बेटी का विवाह जल्दी कराने के लिए
अगर आप अपनी बेटी के रिश्ते को लेकर परेशान हैं या किसी कारणवश उसका विवाह नहीं हो पा रहा है, तो आप इस उपाय से अपनी समस्या का हल निकाल सकते हैं। अशोक के पेड़ के पत्तों को लाकर, कन्या से कहें कि वह उन्हें अपने स्नान के पानी में डालकर उससे स्नान कर ले। ध्यान रखें कि स्नान के समय पत्ते पानी की बाल्टी से बाहर न गिरें। स्नान करने के बाद इन पत्तों को कन्या या परिवार का कोई भी अन्य सदस्य पीपल के पेड़ के नीचे डाल दे। ऐसा रोज करना होगा। यह प्रयोग कम से कम 42 दिन तक जरूर करें। ध्यान रहे पीरियडस के दौरान पांच दिन यह प्रयोग नहीं करना है और 42 दिन में ये पांच दिन नहीं जोड़े जायेंगे। ऐसा करने से जल्दी ही कन्या का विवाह हो जायेगा।

बहुत प्रिय है दरिद्रता को घर में रखी ये 3 चीज़ जिस घर में ये होती है जिंदगीभर वहा होता है दुःख

किसी भी व्यक्ति के लिए घर सुकून देने वाली जगह होती है। घर में सुख-समृद्धि के आने का सीधा संबंध घर में रखी हुई वस्तुओं से भी होता है। कई बार ऐसा होता है जब हम जाने-अनजाने में कुछ ऐसी चीजों को घर में रखने लगते है जिसकी वजह से देवी लक्ष्मी हम पर नाराज होने लगती है। देवी लक्ष्मी के नाराज होने की वजह से हर समय धन की हानि होनी लगती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में ऐसी चीजें नहीं होनी चाहिए।

घर में बंद या खराब हुई घड़ी को अच्छा नहीं माना जाता है यह नेगेटिव ऊर्जा को बढ़ाता है। इसलिए धन का नुकसान होने से बचने के लिए बंद घड़ी को तुरंत सही करवा लेना चाहिए।

घर में बना मंदिर खास होता है। कभी भी घर के मंदिर में किसी देवी-देवता की मूर्ति को आमने-सामने नहीं रखनी चाहिए। इससे परेशानियां बढ़ती है और धन का नुकसान होता है।

घर में कभी भी टूटा हुआ कांच नहीं रखना चाहिए इससे नकारात्मक ऊर्जा आने लगती है और आर्थिक नुकसान भी बढ़ता है।

खंडित मूर्ति को भूलकर भी कभी नहीं रखना चाहिए इससे घर में दरिद्रता आती है। इस तरह की मूर्तिओं को नदी या फिर कुएं में प्रवाहित कर देना चाहिए।

घर में कांटेदार पौधों को नहीं लगाना चाहिए इससे घर में बेकार का तनाव रहता है। साथ ही पुरानी और बेकार पड़ी इलेक्ट्रानिक चीजों को तुरंत घर से बाहर कर देना चाहिए।

आज एकादशी की रात एक बड़ी इलायची रख दे पीपल के नीचे बन जाओगे अरबपति

दोस्तों आज एकादशी है जिसे फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को आमलकी एकादशी कहा गया है। यह एकादशी इस वर्ष 26 फरवरी को है। आमलकी का अर्थ होता है आंवला इस एकादशी का महत्व अक्षय नवमी के समान है।

जिस तरह अक्षय नवमी में आंवले के वृक्ष की पूजा होती है उसी प्रकार आमलकी एकादशी के दिन आंवले की वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु की पूजा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

अमालकी एकादशी के दिन आंवले की पूजा का महत्व इसलिए है क्योंकि इसी दिन सृष्टि के आरंभ में आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति हुई थी। दोस्तों आज हम आपको हर घर में हमेशा मौजूद रहने वाली एक वस्तु के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके उपाय से आप धन से मालामाल हो जाएंगे। जी हां, उस वस्तु का नाम इलायची है।

आपको बता दें कि इलायची का इस्तेमाल लगभग हर शुभ काम में किया जाता है साथ ही इलायची आपकी सभी समस्याओं का निवारण भी करती है। चलिए हम आपको बताते हैं इलायची से जुड़े वे सभी उपाय जो आपको पैसों से मालामाल कर देगा।

एक हरी इलायची हाथ में लेकर पूजा गृह में प्रवेश करें। इसके बाद हाथ जोड़कर ॐ श्रीं श्रीयै नमः! मंत्र का उच्चारण करें। भगवान का नाम लेकर इस मंत्र का जाप 108 बार करें। ध्यान रहे, आपकी पूजा कोई भंग ना करे। यह पूजा तभी करें जब आप अकेले हों।

पूजा गृह में खड़े होकर इलायची को दाहिने मुट्ठी में बंद कर लें। इसी स्थिति में घर के सभी कमरों से होते हुए घर की 7 बार परिक्रमा कर पूजाघर में प्रवेश करें।
इस इलायची को लाल धागे सहित लाल पोटली में बांध दें। और इस पोटली को घर में ही ऐसी जगह छिपाकर रख दें जहां किसी की नजर ना जा सके।

21 दिन तक इस पोटली को बिना छुए रहने दें। 21 दिन बाद इस पोटली को किसी नदी अथवा तालाब में विसर्जित कर दें। अगर आस पास कोई पेड़ हो तो उसकी मिटटी में दबा दे । पीपल वृक्ष के नीचे गाड़ना अति फलदायी रहेगा।
इस उपाय के करते ही कुछ ​ही दिनों में आपके रूके हुए काम पूर होने लगेंगे। आय में लगातार बढ़ोतरी दिखनी शुरू हो जाएगी और आप लाखों-करोड़ों की कमाई करने लगेंगे।

26 फरवरी एकादशी तुलसी के निचे रख दे 1 रुपए का सिक्का आँखों के सामने होगा चमत्कार

दोस्तों फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को आमलकी एकादशी कहा गया है। यह एकादशी इस वर्ष 23 मार्च को है। आमलकी का अर्थ होता है आंवला इस एकादशी का महत्व अक्षय नवमी के समान है।

जिस तरह अक्षय नवमी में आंवले के वृक्ष की पूजा होती है उसी प्रकार आमलकी एकादशी के दिन आंवले की वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु की पूजा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

आमलकी एकादशी के विषय में कई पुराणों में वर्णन मिलता है। आध्यात्मिक विषयों के जानकार ‘पण्डित जयगोविंद शास्त्री’ बताते हैं कि अमालकी एकादशी के दिन आंवले की पूजा का महत्व इसलिए है क्योंकि इसी दिन सृष्टि के आरंभ में आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति हुई थी।

एकादशी की शाम को तुलसी के सामने गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक प्रज्वलित करें। उसके बाद ऊँ वासुदेवाय नम: मंत्र का जाप करते हुए तुलसी की 11 परिक्रमा करें। इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है।

यदि कोई व्यक्ति सभी कार्यों में सफलता प्राप्त करना चाहता है तो वह तुलसी की जड़ को विधिपूर्वक यानी तुलसी की जड़ को निमंत्रण देकर अपने घर ले आएं। घर पहुंचकर तुलसी की जड़ को गंगाजल से धो लें। इसके बाद इसका पूजन करें। पूजन के बाद इस जड़ को दाएं हाथ पर पीले कपड़े में लपेटकर बांध लें।

पूजन करते समय किसी तुलसी मंत्र का जप करेंगे तो श्रेष्ठ रहेगा। यह एक तांत्रिक उपाय है और इसे करने पर आपको धन संबंधी कार्यों में भी विशेष सफलता प्राप्त होगी। ये उपाय आपको एकादशी पर ही करना है इस दिन किया गया ये उपाय कभी कारगार साबित होता है

दोस्तों अब में जो आपको सबसे महत्वपूर्ण उपाय बताने जा रही वो ये है एकादशी की रात आपको तुलसी के निचे एक रुपए का सिक्का चुपचाप रख देना है और विधि विधान करे तथा देवी घी का दीपक जलाये ऐसा करने से आपके घर में धन का आना सुरु हो जायेगा और आपकी सारी परेशानिया खत्म हो जाएँगी