दूसरा नवरात्री – माँ ब्रह्मचारिणी व्रत एवं पूजा विधि |

भारतीय संस्‍कृति की हिन्‍दु मान्‍यता के अनुसार मां दुर्गा का ब्रह्मचारिणी रूप, हिमालय और मैना की पुत्री हैं, जिन्‍होंने भगवान नारद के कहने पर भगवान शंकर की ऐसी कठिन तपस्‍या की, जिससे खुश होकर ब्रम्‍हाजी ने इन्‍हे मनोवांछित वरदान दिया जिसके प्रभाव से ये भगवान शिव की पत्‍नी बनीं।

संस्‍कृत भाषा में ब्रह्म का अर्थ होता है तपस्या, यानी तप का आचरण करने वाली माता भगवती के रूप को ही माता ब्रह्मचारिणी के नाम से जाना जाता है और नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के इस रूप की उपासना की जाती है।ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है। मां के दाहिने हाथ में जप की माला है और बायें हाथ में कमण्डल है तथा मान्‍यता ये है कि माता ब्रह्मचारिणी की पूजा और साधना करने से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है।

कुण्‍डलिनी शक्ति एक ऐसी शक्ति होती है, जिसके जाग्रत होने पर व्‍यक्ति का जीवन सफल हो जाता है। वह जो चाहता है, वैसा ही होता है। सम्‍पूर्ण प्रकृति उसके कहे अनुसार काम करने लगती है। इसलिए कुण्‍डलिनी जागरण को भारतीय संस्‍कृति में सबसे कठिन साधना भी माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की उपासना करने के लिए जिस मंत्र की साधना की जाती है, वो निम्‍नानुसार है:

यादेवीसर्वभू‍तेषुमाँब्रह्मचारिणीरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माता ब्रह्मचारिणी की पूजा से भक्त को मिलती है यह शक्ति

नवरात्रे के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी जी की पूजा करने से भक्त का ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र जाग्रत होने लगता है. व्यक्ति का यदि यह चक्र चलने लगे तो वह मन को एक स्तर तक काबू करने लगता है. तो दूसरे दिन की पूजा से माँ ब्रह्मचारिणी भक्त को यही शक्ति देती हैं.

पूजन विधि

सबसे पहले आप माता के सामने कंडी जलायें और उसमें कपूर के लौंग की आहुति दें. उसके बाद माता को फूल अर्पित करें. आचमन करें और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें. माता की आरती करें और गणेश भगवान की आरती सबसे पहले करना ना भूलें.

ध्यान मन्त्र कभी ना भूलें

इधाना कदपद्माभ्याममक्षमालाक कमण्डलु
देवी प्रसिदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्त्मा|| 

जब आपकी पूजा और आरती हो जाये तो आप पूजन स्थान पर बैठे-बैठे कम से कम 108 बार माता का ध्यान इस मन्त्र के साथ करें. यही वह मन्त्र है जो भक्त के ज्ञान को खोलता है. आँखें खोलकर इस मन्त्र को पढ़ें. जब मन्त्र का जाप 108 बार हो जाये तो उसके बाद आँखें बंदकर ध्यान मष्तिष्क पर स्थित दसवें द्वार पर लगायें और कम से कम 10 मिनट माता को यहाँ देखें. आप 10 मिनट बाद ही खुद को सकारात्मक और पहले अधिक ऊर्जावान महसूस करेंगे. इसी तरह से बड़े-बड़े सिद्ध लोग माता का ध्यान लगाने की कोशिश करते हैं.

तो माता के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी जी की पूजा आप कुछ इस तरह से कर सकते हैं. माता दयालु हैं वह आपकी गलतियों को जरुर माफ़ कर देंगी.

इस नवरात्री माँ पधार रही है आपके द्वार कीजिये मैया का स्वागत सम्पूर्ण नियम और विधि विधान के साथ |

नवरात्री के नौ दिनों तक देवी माँ के एक स्वरुप की पूजा की जाती है। जो इस प्रकार है :-
1 अकटूबर , 2016 ( शनिवार )      – प्रतिपदा तिथि   –  घटस्थापना  , श्री शैलपुत्री पूजा
2 अकटूबर , 2016  ( रविवार )      – प्रतिपदा तिथि   – चंद्र दर्शन , श्री शैलपुत्री पूजा
3  अक्टूबर , 2016 (  सोमवार )     – द्वितीया तिथि     – श्री ब्रह्मचारिणी पूजा
4 अक्टूबर , 2016 ( मंगलवार )      – तृतीय तिथि       – श्री चंद्रघंटा पूजा
5 अक्टूबर , 2016  ( बुधवार )        – चतुर्थी तिथि       – श्री कुष्मांडा पूजा
6 अक्टूबर , 2016  ( गुरुवार )        – पंचमी तिथि       – श्री स्कन्दमाता पूजा
7 अक्टूबर , 2016  ( शुक्रवार )       – षष्ठी तिथि          – श्री कात्यायनि पूजा
8 अक्टूबर , 2016 ( शनिवार )       – सप्तमी तिथि      – श्री कालरात्रि पूजा
9 अक्टूबर , 2016  ( रविवार )       – अष्टमी तिथि        – श्री महागौरी पूजा , महा अष्टमी पूजा , सरस्वती पूजा
10 अक्टूबर , 2016 ( सोमवार )    – नवमी तिथि         – श्री सिद्धिदात्री पूजा , महा नवमी पूजा , आयुध पूजा , नवमी होम
11 अक्टूबर , 2016 ( मंगलवार )   – दशमी तिथि        –  दुर्गा विसर्जन , विजया दशमी , दशहरा
घट स्थापना
नवरात्री में घट स्थापना का बहुत महत्त्व है। नवरात्री की शुरुआत घट स्थापना से की जाती है।कलश को सुख समृद्धि , ऐश्वर्य देने वाला तथा मंगलकारी माना जाता है। कलश के मुख में भगवान विष्णु गले में रूद्र , मूल में ब्रह्मा तथा मध्य में देवी शक्ति का निवास माना जाता है। नवरात्री के समय ब्रह्माण्ड में उपस्थित शक्तियों का घट में आह्वान करके उसे कार्यरत किया जाता है।
इससे घर की सभी विपदा दायक तरंगें नष्ट हो जाती है तथा घर में सुख शांति तथा समृद्धि बनी रहती है।