कच्चे धागे से बांधे शनिदेव से पक्का रिश्ता कटेगा शनि का प्रकोप

भक्तों को यकीन है कि मंदिर में पूजा करने और शनिदेव पर सरसों का तेल चढ़ाने से सात हफ्तों में साढ़ेसाती से छुटकारा मिल जाता है. यही नहीं ग्रहों की टेढ़ी चाल से भी मुक्ति मिलती है. लेकिन जिस ग्रह की टेढ़ी चाल से छुटकारा पाना हो उस राशि के दिन आकर कच्चा धागा बांधना होता है, फिर शनि के साथ ग्रहों की बिगड़ी चाल का भी निवारण हो जाता है.

कहते हैं यहां सरसों का तेल और दाल चढ़ाने से शनिदेव जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं. भक्त यहां आकर एक तरफ जहां शिव से सुख समृद्धि का वरदान मांगते हैं वहीं शनि देव से कष्टों से मुक्ति का आशीर्वाद पाते हैं.

शनि की टेढ़ी चाल से किसे डर नहीं लगता, उनके क्रोध से देवता भी थर-थर कांपते हैं, कहते हैं शनि की कृपा राजा को रंक और रंक को राजा बना सकती है. लेकिन सर्वशक्तिमान शनिदेव भी एक बार मजबूर हो गए थे, उनके अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगे थे. सवाल भी कुछ ऐसा जिसने न केवल उन्हें बल्कि उनकी मां छाया को भी झकझोर कर रख दिया और उन्हें कर दिया बेघरबार.

महाकाल का ये मंदिर शनि की व्यथा सुनाता है, उन की मजबूरी की कहानी सुनाता है. हिमाचल के महाकाल गांव में बना ये मंदिर न केवल उस घटना का गवाह है बल्कि शिव और शनि के अटूट रिश्ते का आधार भी यही मंदिर है.

शनिदेव सूर्य और छाया के पुत्र हैं, लेकिन रंग-रूप बिल्कुल अलग. सूर्य एकदम चमकते-दमकते और शनि तवे जैसे काले और उसपर उनका क्रोधी स्वभाव. कहते हैं सूर्यदेव को संदेह हो गया कि क्या वाकई शनि उनके पुत्र हैं, उनके इस शक को देवताओं ने और बढ़ाने का काम किया. पति के इस आरोप से छाया व्यथित हो उठीं. सूर्यदेव ने पुत्र सहित छाया का त्याग कर दिया. कहते हैं बड़े होने पर जब शनि ने मां से अपने पिता के बारे में पूछा तो छाया ने पूरी कहानी बताई.

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