स्कंदमाता

हिन्‍दु धर्म की मान्‍यतानुसार जब अत्याचारी दानवों का अत्याचार बढ़ता है, तब स्‍कंदमाता, संत जनों की रक्षा के लिए सिंह पर सवार होकर दुष्टों का अंत करती हैं।

देवी स्कन्दमाता की चार भुजाएं हैं जहां माता अपने दो हाथों में कमल का फूल धारण करती हैं और एक भुजा में भगवान स्कन्द या कुमार कार्तिकेय को सहारा देकर अपनी गोद में लिये बैठी हैं जबकि मां का चौथा हाथ भक्तो को आशीर्वाद देने की मुद्रा मे होता है।

देवी स्कन्द माता ही हिमालय की पुत्री पार्वती हैं, जिन्‍हें माहेश्वरी और गौरी के नाम से भी जाना जाता है। ये पर्वत राज की पुत्री होने की वजह से पार्वती कहलाती हैं, महादेव की वामिनी यानी पत्नी होने से माहेश्वरी कहलाती हैं और अपने गौर वर्ण के कारण देवी गौरी के नाम से पूजी जाती हैं।

स्‍कंदमाता को अपने पुत्र से अत्‍यधिक प्रेम है, अत: मां को अपने पुत्र के नाम के साथ संबोधित किया जाना अच्छा लगता है। इसलिए मान्‍यता ये भी है कि जो भक्त माता के इस स्वरूप की पूजा करते है, मां उस पर अपने पुत्र के समान स्नेह लुटाती हैं।

नवरात्र के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की उपासना की जाती है और मां आदिशक्ति का ये ममतामयी रूप है। गोद में स्कन्द यानी कार्तिकेय स्वामी को लेकर विराजित माता का यह स्वरुप जीवन में प्रेम, स्नेह, संवेदना को बनाए रखने की प्रेरणा देता है। भगवान स्कंद ‘कुमार कार्तिकेय’ नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में स्कंद को कुमार और शक्ति कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इन्हीं भगवान स्कंद की माता होने के कारण मां दुर्गा के इस स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है।

मान्यता है कि स्कंदमाता की पूजा से सभी मनोरथ पूरे होते हैं। इस दिन साधक का मन ‘विशुद्ध‘ चक्र में अवस्थित होता है। मां स्कंदमाता की उपासना से भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं तथा साधक को शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। स्कंदमाता की उपासना से बालरूप स्कंद भगवान की उपासना अपने आप हो जाती है। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण स्कंदमाता की पूजा करने वाला व्यक्ति अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है। मां स्‍कंदमाता की उपासना करने के लिए निम्‍न मंत्र की साधना करना चाहिए:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ स्‍कंदमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

स्कन्द माता की पूजा विधि :-

प्रातः जल्दी उठ माता का ध्यान कर व्रत का संकल्प ले, स्नान आदि के बाद माता की चौकी पर कलश के सामने ही स्कन्द माता की प्रतिमा या तस्वीर रखे. इसके बाद वैदिक एवं सप्तशती मंत्रो द्वारा स्कन्द माता के सहित सभी देवी देवताओ का स्मरण कर उनकी पूजा करें. हाथ में पिले पुष्प लेकर स्कन्द माता के प्रतिमा के समाने उनके दिव्य रूप का दर्शन करें , माता का ध्यान करने के बाद पुष्प को चौकी में छोड़ दे तथा यंत्र या मनोकामना गुटिका द्वारा पंचोपचार विधि से पूजन करें. इस दिन स्कन्द माता को पीले नवैद्य का भोग व पीले पुष्प अर्पित करने चाहिए. माता के आरती के पश्चात उन्हें पुष्पांजलि अर्पित कर उनके निम्न मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए.

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