एक ऐसी सत्य घटना जो आपको विवश करें देगी ”पुनर्जन्म” में विश्वास करने पर !

जिस किसी ने भी इस मृत्युलोक में जन्म लिया है, यह निश्चित है की एक ना एक दिन उसकी मृत्यु होनी है. यह हमारे जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है तथा प्रकृति का यह कानून है.

मृत्यु के बाद का क्या होता है इस सवाल का जवाब वर्षो से एक पहेली बना हुआ है.

वैज्ञानिक दृष्टि से अगर बात की जाए तो विज्ञान का मानना है की कोई भी मरने के बाद पुनः पैदा नहीं हो सकता .

लेकिन आज हम आपको जिस कहानी के बारे में बताने जा रहे वह विज्ञान की आँखों से आँख मिलाकर खड़ी है, जिसके सामने विज्ञान के सारे तर्क फीके पड़ते दिखाई देते है.

यह कहानी है शांति देवी की, वर्ष 1930 में दिल्ली में शांति का जन्म एक खुशहाल परिवार में बाबू बहादुर माथुर के यहाँ हुआ था. बचपन में उसका विकास अन्य समान्य बच्चों की तरह ही हो रहा था परन्तु जब वह चार साल की हुई उसने अजीब अजीब से बाते करनी शुरू कर दी.

उसने अपने माता पिता को पहचानने से इंकार कर दिया, उसका कहना था की अभी वह जा रह रही है यह उसका घर नहीं है वास्तव में उसका घर वहां से काफी दूर मथुरा में है जहां उसका पूरा परिवार रहता है.

उस मात्र चार साल की लड़की ने कहा की उसका नाम भी शान्ति देवी नहीं है बल्कि उसका वास्तविक नाम लुडगी देवी है.

उसके पति का नाम केदार नाथ चौबे है तथा उसे सब चौबाइन कह कर बुलाते थे. उसकी मौत बच्चे के जन्म के समय हुई थी.

क्यों किया था भगवान शिव ने श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का वध ?

भगवान श्री कृष्ण तथा उनके परम मित्र सुदामा दोनों अपनी मित्रता के लिए शास्त्रों में जाने जाते है. सरल तथा शांत स्वभाव वाले भगवान श्री कृष्ण के ह्रदय में गोकुलवासी सुदामा ने अपनी एक अलग सी छवि बनाई थी जिसे आज भी दुनिया मित्रता के प्रतिरूप में याद करती है.

परन्तु वाही भगवान श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का एक ऐसा रूप भी था जिसका स्वयं महादेव शिव ने वध किया था. माना इस तथ्य पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है परन्तु हिन्दू धर्म के पुराणों की कथा के अनुसार यह सच उभर कर आता है.

आखिर क्यों भगवान शिव को भगवान श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का वध करना पड़ा आइये जानते है इस कथा के माध्यम से.

स्वर्ग के विशेष भाग गोलोक में सुदामा और विराजा नाम की एक कन्या निवास करती थी. विराजा को भगवान श्री कृष्ण से प्रेम था परन्तु सुदामा विराजा से प्रेम करने लगे.

एक बार विराजा भगवान श्री कृष्ण के आकर्षण में उनके पास चली गई, विराजा तथा भगवान श्री कृष्ण को राधा जी जब एक साथ देखा तो क्रोध में उन्होंने विराजा को श्राप दे दिया की वह गोलोक से पृथ्वीलोक में निवास करेगी. किसी कारणवश सुदामा को भी एक श्राप के कारण पृथ्वीलोक में जन्म लेना पड़ा.

क्यों करना पड़ा श्री कृष्ण को कर्ण का अंतिम संस्कार

कोंन थे दानवीर कर्ण जाने उनकी पूरी कहानी जनम से मृत्यु तक :-

महाभारत का युद्ध ( mahabharat yuddha )अधर्म पर धर्म की विजय को दर्शाता है जिसमे भगवान् श्री कृष्ण का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान था. जब दुर्योधन ने अपनी तरफ सेना मांगी तो श्री कृष्ण को पांडवो की तरफ होना पड़ा . महाभारत में कौरवों और पांडवो की सेना में अनेको योद्धा थे जिन्होंने युद्ध में विशेष भूमिका निभाई और वीरगति को प्राप्त हुए तथा अपना नाम सदा सदा के लिए महाभारत ग्रन्थ में लिख दिया.

इन्ही योद्धाओं में से एक था दानवीर कर्ण जो कौरवों की तरफ से लड़े और वीरगति को प्राप्त हुए लेकिन आज हम आपको कुछ दानवीर कर्ण के बारे में कुछ ऐसी बातें बताएँगे जो सायद ही आपने पहले कभी सुनी होंगी.

आप सब जानते है की कर्ण के पिता सूर्य और माता कुंती थी और पांडवो के ज्येष्ठ भ्राता थे, पर उनका पालन एक रथ चलाने वाले ने किया था, इसलिए वो सूतपुत्र कहलाएं और इसी कारण उन्हें वो समाज में कभी सम्मान नहीं मिला, जिसके वो अधिकारी थे। इस लेख में आज हम महारथी कर्ण से सम्बंधित कुछ रोचक बातें जानेंगे।

कर्ण के वध में भगवान् श्री कृष्ण का बहुत योगदान था जिन्होंने अर्जुन को कर्ण वध का रास्ता सुझाया. भगवान् श्री कृष्ण जानते थे की कर्ण बहुत ही दानवीर योद्धा थे लेकिन जब कर्ण मृत्युशैया पर थे तब कृष्ण उनके पास उनके दानवीर होने की परीक्षा लेने के लिए आए। कर्ण ने कृष्ण को कहा कि उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। ऐसे में कृष्ण ने उनसे उनका सोने का दांत मांग लिया।

कर्ण ने अपने समीप पड़े पत्थर को उठाया और उससे अपना दांत तोड़कर कृष्ण को दे दिया। कर्ण ने एक बार फिर अपने दानवीर होने का प्रमाण दिया जिससे कृष्ण काफी प्रभावित हुए। कृष्ण ने कर्ण से कहा कि वह उनसे कोई भी वरदान मांग़ सकते हैं।

कर्ण ने कृष्ण से कहा कि एक निर्धन सूत पुत्र होने की वजह से उनके साथ बहुत छल हुए हैं और पूरी जिंदगी मुझे हालत के साथ समझौता करना पड़ा. इसीलिए अगली बार जब कृष्ण धरती पर आएं तो वह पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन को सुधारने के लिए प्रयत्न करें. इसके साथ कर्ण ने दो और वरदान मांगे.

दूसरे वरदान के रूप में कर्ण ने यह मांगा कि अगले जन्म में कृष्ण उन्हीं के राज्य में जन्म लें और तीसरे वरदान में उन्होंने कृष्ण से कहा कि उनका अंतिम संस्कार ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहां कोई पाप ना हो।

हनुमान जी का सबसे शक्तिशाली शाबर मंत्र जिसके जाप से बन जाते है बिगड़े काम

Shaktishali shidh shabar mantra – हनुमान शाबर मंत्र:

शाबर मन्त्र को को स्वयंसिद्धि मन्त्र के नाम से भी पुकारा जाता है यह मन्त्र अत्यन्त शक्तिशाली एवं अचूक है. अगर आप को लग रहा है की आप के दूकान अथवा घर आदि में किसी ने टोटका आदि कर रखा है अथवा घर में कोई व्यक्ति ज्यादा बीमार है, निर्धनता आपका पीछा नहीं छोड़ती, या कोई कार्य बनते बनते बिगड़ जाता हो

अथवा कोई तांत्रिक क्रिया द्वारा आपको बार बार परेशान कर रहा हो तो इन सब कष्टों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए शाबर मन्त्र को सबसे सिद्ध एवं प्रभावकारी माना गया है.

शाबर मन्त्र अन्य शास्त्रीय मंत्रो के भाँति उच्चारण में कठिन नहीं होते है, तथा इस अचूक मन्त्र को कोई भी बड़े आसनी प्रयोग कर अपने कायो को सिद्ध कर सकता है.

इन मंत्रो को थोड़े से जाप द्वारा सिद्ध किया जा सकता है तथा यह मन्त्र शीघ्र प्रभाव डालते है. इन मंत्रो का जो प्रभाव होता वह स्थायी है तथा शक्तिशाली हनुमान मन्त्र का कोई भी दुसरा काट नहीं है.

शाबर मंत्रो के सरल भाषा में होने के कारण इनका प्रयोग बहुत ही आसान है कोई भी इन्हे सुगमता से प्रयोग कर सकता है. यह मन्त्र दूसरे दुष्प्रभावी मंत्रो के काट में सहायक है.

शाबर मन्त्र के प्रयोग से प्रत्येक समस्या का निराकरण सहज ही जाता है. इस मन्त्र का प्रयोग कर व्यक्ति अपने परिवार, मित्र, संबंधी आदि की समस्याओं का निवारण करने में सक्षम है.

वैदिक, पौराणिक एवम् तांत्रिक मंत्रों के समान ‘शाबर-मंत्र’ भी अनादि हैं. सभी मंत्रों के प्रवर्तक मूल रूप से भगवान शंकर ही हैं, परंतु शाबर मंत्रों के प्रवर्तक भगवान शंकर प्रत्यक्षतया नहीं हैं, फिर भी इन मंत्रों का आविष्कार जिन्होंने किया वे परम शिव भक्त थे.

गुरु गोरखनाथ तथा गुरु मछन्दर नाथ शबरतंत्र के जनक माने जाते है. अपने साधन, जप-तप एवं सिद्धियो के प्रभाव से उन्होंने वह स्थान प्राप्त कर लिया जिसकी मनोकामना बड़े-बड़े तपस्वी एवं ऋषि मुनि करते है.

शाबर मंत्रो में ”आन शाप” तथा ”श्रद्धा और धमकी” दोनों का प्रयोग किया जाता है. साधक याचक होते हुए भी देवता को सब कुछ कहने का सामर्थ्य रखता है व उसी से सब कुछ करना चाहता है.

विशेष बात यह है कि उसकी यह ‘आन’ भी फलदायी होती है. आन का अर्थ है सौगन्ध. अभी वह युग गए अधिक समय नहीं बीता है, जब सौगन्ध का प्रभाव आश्चर्यजनक व अमोघ हुआ करता था.

शाबर मंत्रो में गुजराती, तम्मिल, कन्नड़ आदि भाषाओं का मिश्रण है. वैसे समान्यतः अधिकतर शाबर मन्त्र हिंदी में ही मिलते है.

प्रत्येक शाबर मंत्र अपने आप में पूर्ण होता है. उपदेष्टा ‘ऋषि’ के रूप में गोरखनाथ, सुलेमान जैसे सिद्ध पुरूष हैं. कई मंत्रों में इनके नाम का प्रवाह प्रत्यक्ष रूप से तो कहीं केवल गुरु नाम से ही कार्य बन जाता है.

इन मंत्रों में विनियोग, न्यास, तर्पण, हवन, मार्जन, शोधन आदि जटिल विधियों की कोई आवश्यकता नहीं होती. फिर भी वशीकरण, सम्मोहन, उच्चाटन आदि सहकर्मों, रोग-निवारण तथा प्रेत-बाधा शांति हेतु जहां शास्त्रीय प्रयोग कोई फल तुरंत या विश्वसनीय रूप में नहीं दे पाते, वहां ‘शाबर-मंत्र’ तुरंत, विश्वसनीय, अच्छा और पूरा काम करते हैं.

आइये अब हम आपको सिद्ध शाबर मन्त्र के प्रयोग के बारे में बताए तथा इससे जुडी कुछ विशेष तथा ध्यान रखने वाली बातो के विषय में बताए.

रामायण काल के ऐसे श्राप, जिन्होंने हिला दी थी इतिहास की नींव !

रामायण काल के श्राप की कहानिया : –

1 . नंदी का रावण को श्राप :- एक बार रावण भगवान शिव से भेट करने कैलाश पर्वत गया तो बिछ मार्ग में ही रावण का समाना नंदी से हो गया. नंदी के मुख को देख रावण जोर-जोर से हसने लगा तथा उन्हें वानर कह क़र चिढ़ाने लगा. तब नंदी ने रावण को श्राप दिया की एक दिन वानरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा.

2 . राजा अनरण्य का रावण को श्राप :- वाल्मीकि रामायण के अनुसार रघुवंश में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था. जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुई. उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई. मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा. इन्हीं के वंश में आगे जाकर भगवान श्रीराम ने जन्म लिया और रावण का वध किया.

3 . तपस्वनी का रावण को श्राप :- वाल्मीकि रामयाण के अनुसार एक बार एक तपस्विनी भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए भगवान विष्णु की तपस्या क़र रही. आकाश मार्ग से जाते हुए रावण की नजर उस तपस्वनी पर पड़ी और वह उस पर आकर्षित हो गया. उसने तपस्विनी के बाल पकड़कर उसे लंका ले जाने की कोशिश करी परन्तु उस तपस्विनी ने अग्नि में भष्म होकर अपने प्राणो की आहुति दे दी तथा रावण को श्राप दिया की स्त्री के कारण ही तेरा नाश होगा.

4 . शूर्पणखा का रावण को श्राप :-वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था. वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था. रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ. उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का वध कर दिया. तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा.

जाने पशुपतिनाथ से जुड़े विचित्र एवं आश्चर्यचकित करने वाले रहस्य !

भगवन शिव को समर्पित पशुपति नाथ मंदिर : – 

भगवान शिव ( shiva ) के मदिर केवल भारत में ही स्थित नहीं है बल्कि ये पुरे विश्व भर में फैले हुए है. महादेव शिव के अनेको पवित्र धाम एवं मंदिर है जिनमे कुछ को अत्यन्त महत्वपूर्ण माने जाते है. हमारे पड़ोसी देश में सम्मलित नेपाल में स्थित भगवान शिव को समर्पित पशुपतिनाथ भी उन महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है.

महादेव शिव के इस पवित्र एवं प्रसिद्ध मंदिर के बारे में कहा जाता है की यहाँ भगवान शिव की मौजूदगी है. पशुपतिनाथ मंदिर के विषय में यह मान्यता है की यह मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक, केदारनाथ का आधा भाग माना जाता है. भगवान शिव का यह मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू के देवपाटन गाव में बागमती नदी के तट पर स्थित है.

महादेव शिव की लीला एवं उनकी कथा अद्भुत एवं निराली है तथा भगवान शिव से जुड़े उनके रहस्य एवं उनकी लीलाएं उनके भक्तो को उनसे जोड़े रखती है.

प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग केदारनाथ का आधा भाग होने के कारण पशुपतिनाथ की महत्वत्ता भगवान शिव के भक्तो के लिए और भी अधिक बढ़ जाती है. आज हम आपको भगवान शिव के पवित्र धाम पशुपतिनाथ से कुछ विचित्र रहस्यों को बारे में बताने जा रहे है.

पशुपतिनाथ मंदिर से जुडी कथा :-

महाभारत के युद्ध में जब पांडवो ने अपने है सगे रिश्तेदारों का रक्त बहाया तो भगवान शिव इस बात से बहुत क्रोधित हो गये. वासुदेव यह जानते थे की वे भगवान शिव पांडवो से रुष्ट है अतः उन्होंने पांडवो को भगवान शिव की वंदना कर उनसे क्षमा मांगने की सलाह दी.

भगवान कृष्ण की सलाह पर पांडव भगवान शिव से क्षमा मांगने गुप्त काशी पहुंचे, परन्तु भगवान शिव पांडवो के आगमन को भांपते हुए उनके भगवान् शिव के सम्मुख पहुंचने से पूर्व ही विलुप्त हो गए.

अंत में पांडव भगवान शिव का पीछा करते करते केदारनाथ पहुंचे परन्तु भगवान शिव ने उनकी नजरो से बचने के लिए भेस का रूप धारण कर लिया तथा पास ही भेस के झुण्ड में जाकर सम्म्लित हो गए. पांडवो ने जब उन भेस के झुंड़ो को देखा तो वे भेस के रूप में परिवर्तित हुए भगवान शिव को पहचान गए. तब भगवान शिव उसी भेस के रूप में धरती में धसने लगे.

तभी भीम ने भेस रूपी भगवान शिव के पास जाकर उन्हें पकड़ लिया तथा अपनी पूरी ताकत से उन्हें रोकने लगे. अतः भगवान शिव को अपने असली रूप में आना पड़ा तथा पांडवो को उन्होंने क्षमा कर दिया.

ऐसा कहा जाता है की भगवान शिव जब पांडवो को क्षमादान कर रहे थे तब उनका आधा देह धरती में ही धसा था जो केदरनाथ पहुंच गया तथा जो उनके मुंह वाला भाग था वह उस स्थान में पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ.

शिवलिंग की पूजा :-

ऐसी मान्यता है की इन दोनों मंदिरों के दर्शन के बाद ही ज्योतिर्लिंग के दर्शन से पूण्य की प्राप्ति होती है. केदारनाथ में भगवान शिव रूप भेस के पीठ की पूजा की जाती है तथा पशुपतिनाथ मंदिर में उस भेस रूपी शिव के सर की पूजा होती है.

नहीं मिलती पशु योनि :-

पशुपतिनाथ मंदिर के बारे में एक और मान्यता यह भी है की इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन द्वारा पशु योनि की प्राप्ति नहीं होती. परन्तु इसके साथ ही यह भी मान्यता है की यदि पशुपतिनाथ के दर्शन के समय कोई व्यक्ति नंदी महाराज के दर्शन करता है तो यह तय है की उसे अगले जन्म में पशुयोनि मिलेगी.

अतः पशुपतिनाथ के दर्शन से पूर्व कभी भी नंदी महराज के दर्शन नहीं करने चाहिए.

मृत्यु के बाद कब और कैसे प्राप्त होता है मनुष्य को शरीर

मृत्यु से जुड़े गरुड़ पुराण के कुछ रोचक तथ्य : –

एक अच्छी जिंदगी तथा लम्बी आयु की कामना तो हर किसी व्यक्ति की होती है परन्तु क्या अपने कभी सोचा है की जब आपकी आत्मा आपके शरीर का साथ झोड़ देगी तब उसका क्या होगा और कब उसे दुसरा शरीर पुनः प्राप्त होगा.

वेदो एवं पुराणों में इस संबंध में अनेक बातो का वर्णन आया है. वेदो में बताई गई तत्वज्ञान से संबंधित इन बातो को उपनिषद अथवा वेदांत कहते है.

वेदांत के अनुसार कुछ मोको पर किसी आत्मा को शरीर तत्क्षण ही प्राप्त हो जाते है फिर वह शरीर मनुष्य का या फिर किसी अन्य जीव का. आत्मा दूसरे शरीर को तीन दिन बाद धारण करती है तभी तीजा बनाई जाती है.

कुछ आत्माएं दुसरा शरीर 10 या 13 दिन बाद धारण करती है, अतः इसी कारण दसवीं व तेरहवीं मनाई जाती है. कुछ आत्माओं को सवा माह यानि 34 से 40 दिन नए शरीर धारण करने में लगते है.

यदि कोई आत्मा प्रेत अथवा पितर योनि में बादल जाती है तो फिर उसके मुक्ति के लिए एक साल के बाद उसकी बरसी करी जाती है फिर 3 वर्ष बाद उसे गया छोड़ के आ जाते है.

ताकि यदि आत्मा या पितर को मुक्ति ना मिल रही हो तो वह गया में ही रहे वही उसे मुक्ति की प्राप्ति होगी.

आत्मा का वास्विक स्वरूप :-

कभी भूल से भी ना करे ये 11 कार्य, अन्यथा हो जायेगी आपकी उम्र कम !

हमारे हिन्दू धर्म में अधिकतर कुछ ऐसे लोग भी होते है जो हिन्दू धर्म का पालन नहीं करते. वे अपने बच्चों को भी हिन्दू संस्कार से दूर रखते है. विद्यालयों में भी बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता. इसी के कारण वे बच्चे जब बड़े होते है तो उनकी जिंदगी हिन्दू धर्म के प्रति विरोधाभास से भरी होती है तथा वे गलत राह पर चलते हुए न केवल अपने परिवार, समाज बल्कि पुरे देश को नुक्सान पहुंचाते है.

यदि वे नुक्सान नहीं भी पहुंचाते तो उनके जिंदगी में उनके अलावा कोई और महत्व नहीं रखता. उनमे वे सारे गुण मौजूद होते है जो समाजविरोधी होते है.

महभारत के अनुसाशन पर्व में विस्तार से धर्म, निति तथा अध्यात्म के संबंध में विस्तार से वर्णन मिलता है. इसमें यह बाते बतलाई गई है की मनुष्य को क्या करना चाहिए और क्या नहीं. इसके अलावा आयुर्वेद तथा वास्तुशास्त्र में भी यह बाते बतलाई गई है की किन कारणों से मनुष्य की आयु घटती है.

आज हम आपको कुछ ऐसे बाते बताने जा रहे जिन्हे आप भूल से भी न करे अन्यथा यह आपकी उम्र में प्रभाव डालती है और आप की उम्र कम होती है.

पहला कर्म :-

जब कोई व्यक्ति झूठे मुंह स्वध्याय करता है अर्थात पढ़ाई करता है यमराज जी उसके उम्र को कम कर देते है. अगर आप अपनी उम्र कम नहीं करवाना चाहते तो कभी भी झूठे मुंह भोजन ना करे.

यदि आप भोजन करने के दौरान बीच से ही जूठे मुंह उठ जाता है तथा फिर से कुछ देर बाद भोजन ग्रहण करने बैठ जाते है तो यह भी आपकी उम्र कम कर देगा.

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार क्यों नहीं होती एक गोत्र में शादी…. !

गौत्र शब्द से अभिप्राय कुल व वंश से है, वास्तव में गौत्र प्रणाली का जो मुख्य उद्देश्य है वह उसको मूल प्राचीनतम व्यक्ति से जोड़ता है. जैसे की एक व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है तो इसका अभिप्राय यह है की उसके पुराने पूर्वज वैदिक ऋषि भारद्वाज से संबंधित थे या यह कह लीजिए की उसका जन्म भारद्वाज पीढ़ी में हुआ था.

आपने एक ही गौत्र में शादी से जुड़ी कोंट्रोवर्सीस के बारे में तो आपने सुना ही होगा. अखबारों में आये दिन कहीं ना कहीं से खबर मिलती है की किसी जोडे की इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकी उन्होने घरवालों की इच्छा के खिलाफ, एक ही गौत्र में शादी करी. खप पंचायत ने तो एक ही गौत्र में विवाह को गैर कानूनी करार दे दिया है.

आइये जानते है इस पुरे विवाद के बारे मैं पुराणों में क्या लिखा है,

विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्ति की संतान ‘गौत्र’ कहलाती है. ब्राह्मणों के विवाह में गौत्र-प्रवर का बड़ा महत्व है. पुराणों व स्मृति ग्रंथों में बताया गया है कि यदि कोई कन्या संगौत्र हो, किंतु सप्रवर न हो अथवा सप्रवर हो किंतु संगौत्र न हो, तो ऐसी कन्या के विवाह को अनुमति नहीं दी जाना चाहिए.

यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भारद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है. आगे चलकर गौत्र का संबंध धार्मिक परंपरा से जुड़ गया और विवाह करते समय इसका उपयोग किया जाने लगा.

ऋषियों की संख्या लाख-करोड़ होने के कारण गौत्रों की संख्या भी लाख-करोड़ मानी जाती है, परंतु सामान्यतः आठ ऋषियों के नाम पर मूल आठ गौत्र ऋषि माने जाते हैं, जिनके वंश के पुरुषों के नाम पर अन्य गौत्र बनाए गए. ‘महाभारत’ के शांतिपर्व (297/17-18) में मूल चार गौत्र बताए गए हैं.

रावण की पत्नी की सहायता द्वारा ही हो पाया था रावण का वध

जानिए किस प्रकार से मंदोदरी ने रावण वध में भूमिका निभाई : – 

हम बचपन से ही अपने बुजर्गो या माता पिता से रामायण की कथा सुनते आये है तथा आज तक हमें सिर्फ यही पता है की रावण की मृत्यु की वजह उसका भाई विभीषण था. विभीषण ने ही श्री राम को अपने भाई रावण के मृत्यु का रहस्य बताया था.

परन्तु वास्तविकता में तो यह बहुत कम लोग ही जानते है की यह कहानी की आधी हकीकत है. क्योकि कहानी का आधा भाग रावण की पत्नी मंदोदरी से जुडा है. आज हम आपको मंदोदरी से जुडा रहस्य बताने जा रहे है.

रावण सहित उसके दो भाई कुम्भकर्ण तथा विभीषण ने ब्र्ह्मा जी की कठिन तपस्या करी तथा उन्हें प्रसन्न करा. जब ब्र्ह्मा जी तीनो भाइयो की कड़ी तपस्या से प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हुए तो रावण ने ब्र्ह्मा जी से अमरता का वरदान मांगा.

ब्र्ह्मा जी ने रावण के इस वरदान पर असमर्थता जताई परन्तु उन्होंने रावण को एक तीर दिया व कहा की यही तीर तुम्हारे मृत्यु का कारण बनेगा.
रावण ने ब्र्ह्मा जी से वह तीर ले लिया तथा उसे अपने महल में ले जाकर सिहासन के पास दीवार में चुनवा दिया.