जब देव राज इंद्र के आगे फीकी पड़ी शकुनि की हर चाल, महाभारत से जुड़ा अनोखा तथ्य !

शकुनी ने युधिष्ठिर को कई बार चौपड़ के खेल में हराया और जिसका परिणाम द्रौपदी का चीर हरण और पांडवों को वनवास फिर अज्ञातवास मिला. लेकिन शकुनी की चाल का जवाब देवराज इंद्र ने ऐसा दिया कि शकुनी चारो खाने चित्त हो गए.

महाभारत युद्ध के दौरान कर्ण को हराना अर्जुन के लिए कठिन था. इंद्र को अंदेशा था कि सूर्य के कवच के कारण कर्ण अर्जुन को पराजित न कर दे.

इसलिए इंद्र ब्रह्मण बनकर इंद्र के पास दान मांगने पहुंच गए. दान में इन्होंने कर्ण से कवच और कुंडल मांग लिया जिससे शकुनी और दुर्योधन का कर्ण को सेनापति बनाने की चाल नाकामयाब हुई.

शकुनी ने जुए में जब पांडवों को हरा दिया और 12 वर्ष का वनवास और एक साल का अज्ञातवास दिया तब इंद्र ने अज्ञातवास के दौरान अर्जुन की पहचान छिपाने के लिए गजब की चाल चली.

इंद्र ने दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए अर्जुन को स्वर्ग बुलाया यहां अर्जुन को उर्वशी नाम की अप्सरा से नपुंसक होने का शाप मिल गया.

अर्जुन के दिव्य धनुष गांडीव की 7 विशेषताएं, जिसे जान आप रह जाएंगे आश्चर्यचकित !

कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़े गए भीषण युद्ध में अर्जुन ने अपने दिव्य अस्त्र गांडीव के दम पर न केवल कौरवों की विशाल सेना बल्कि उस पक्ष में उपस्थित महान योद्धाओं को भी परास्त कर विजयी हासिल करी.

दिव्य धनुष गांडीव के कारण ही महाभारत युग में सभी लोग अर्जुन को महान धनुधर मानते थे. अर्जुन ने अपने इस प्रिय अस्त्र के लिए यह प्रतिज्ञा ली थी की जो भी व्यक्ति इस गांडीव धनुष को उनसे मांगेगा, वह उसी क्षण उसकी हत्या कर देंगे.

आइये जानते है की आखिर इस धनुष में ऐसी क्या खूबी थी जिसके आवाज मात्र से शत्रु भयभीत हो जाते थे.

1 . प्रभु श्री राम को गांडीव धनुष भगवान विष्णु के अंशावतार परशुराम जी से उस वक्त प्राप्त हुआ था जब देवी सीता के स्वयम्बर में श्री राम ने शिव धनुष तोड़ा तथा तब वहां परशुराम जी पधारे थे.

यह धनुष श्री राम जी से अर्जुन के पास कैसे पहुंचा इससे पहले यह जान लेते है की यह दिव्य धनुष आया कहा से था.

2 . विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार यह कथा मिलती है की इस दिव्य धनुष का निर्माण ब्र्ह्मा जी ने किया था तथा बाद में इस धनुष को उन्होंने संहारकर्ता भगवान शिव को प्रदान किया.

भगवान शिव ने यह दिव्य धनुष पाताल में राक्षसों के बढ़ते पाप को रोकने के लिए तथा उनके संहार के लिए परशुराम को दिया था.

यदि चाहते है माँ लक्ष्मी की कृपा तो सुबह करें सिर्फ ये एक काम !

हमारे सनातन धर्म में भक्तो द्वारा अनेक देवी देवताओ को पूजा जाता है, तथा सभी देवी-देवताओ का अपना विशेष स्थान एवं महत्व है. परन्तु सभी देवी देवताओ में से कुछ देवी देवताओ की कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त कुछ भी करने को तैयार है.

वे भक्तो की आस्था एवं तपस्या से प्रसन्न होकर उन पर अपनी कृपा कर दे, यही भक्तो की कामना रहती है.

भगवान विष्णु की धर्म पत्नी माता लक्ष्मी का महत्व भी कुछ ऐसा ही है, माता लक्ष्मी का आशीर्वाद एवं उनकी कृपा प्राप्त हो जाए यह हर किसी का स्वप्न रहता है. क्योकि यदि माता लक्ष्मी एक बार अपनी कृपा भक्त पर बरसा देती है तो उस भक्त को कभी कंगाली का सामना नहीं करना पड़ता.

माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए शास्त्रों में अनेक बाते कही गई है. माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए उन्हें किस मन्त्र, किस उपाय एवं किस प्रकार के कर्मो से प्रसन्न किया जा सकता है, ये सभी बाते शास्त्रों में वर्णित है.

देवी लक्ष्मी के केवल मन्त्र को ही नहीं बल्कि उनके श्रृंगार के समान सहित उनके धारण किये गए आभूषणो को भी पूजनीय बतलाया गया है. माता लक्ष्मी के द्वारा धारण किये गए सिंदूर को पवित्र एवं पूजनीय माना गया है. अनेक शुभ कार्यो एवं त्योहारों में माता लक्ष्मी के पद चिन्हों की पूजा करी जाती है.

यदि अंगद नहीं करता मंदोदरी का अपमान तो राम के साथ युद्ध में विजयी हो जाता रावण, अनसुनी कथा !

माता सीता को रावण की कैद से मुक्त करने के लिए भगवान श्री राम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई कर दी. लंका पहुंचने से पूर्व उनके सामने एक विशाल सागर बाधा के रूप में सामने आई परन्तु श्री राम ने नल-नील की सहायता से उस विशाल सागर पर एक सेतु का निर्माण करवाया.

रावण की सेना बहुत ही विशाल एवं मायावी थी इसके साथ ही उसके पास एक से बढ़कर एक योद्धा थे. राम की सेना में भी एक से बढ़कर एक योद्धा थे उनमे से ही एक पराक्रमी योद्धा था अंगद.

अंगद वानर राज बाली का पुत्र था तथा वह अपने पिता के समान ही बलशाली एवं बुद्धिमान था.

राम एवं रावण के बीच हुए इस भयंकर युद्ध में रावण के सभी प्रमुख वीर योद्धा मारे गए, अब केवल रावण ही शेष रह गया था. तब रावण ने प्रभु राम से युद्ध में विजयी प्राप्त करने के लिए एक बहुत ही विशाल यज्ञ का आयोजन करवाया.

इस यज्ञ में रावण द्वारा विद्वान महृषियो को आमंत्रित किया गया. यहाँ तक की स्वर्ग से देवी देवताओ को इस यज्ञ को सम्पन्न करने के लिए बुलाया गया. रावण के भय से देवताओ को उस यज्ञ में सम्म्लित होना पड़ा.

देवराज इंद्र रावण की नजर से छुपते हुए प्रभु राम के पास पहुंचे तथा उन्होंने श्री राम को रावण के यज्ञ के विषय में बतलाया. तब भगवान श्री राम ने अंगद को रावण के इस यज्ञ को रोकने के लिए कुछ वानरों के साथ भेजा.

रावण को महृषियो ने यज्ञ से पूर्व यह चेतावनी दी थी की चाहे कुछ भी हो जाए उसे यज्ञ के सम्पन होने के बाद ही उठना है, अगर वह भूल से भी यज्ञ सम्पन होने से पूर्व अथवा यज्ञ के बीच में उठ जाए तो उसे यज्ञ का फल प्राप्त नहीं होगा .

आखिर अर्जुन का पुत्र क्यों पूजा जाने लगा भगवान के रूप में

महाभारत की एक अनसुनी कथा 

हमारे हिन्दू धर्म में देवी-देवताओ को पूजने की मान्यता है. जैसे महादेव शिव को असुरो एवं देवो दोनों के देव के रूप में जाना एवं पूजा जाता है. वही भगवान श्री कृष्ण को प्रेम एवं धर्म के देव के रूप में पूजा जाता है.

परन्तु क्या आप जानते है की महाभारत के प्रसिद्ध पात्र अर्जुन के पुत्र को भी भगवान के रूप में पूजा जाता है, आज हम आपको महाभारत के एक विचित्र कथा के रूप में बताने जा रहे है जिसमे हम आपको बताएंगे की आखिर अर्जुन के उस पुत्र का क्या नाम था और कौन उन्हें पूजते है.

महाभारत के इस कथा के अनुसार एक बार अर्जुन को द्रोपदी के साथ विवाह की एक शर्त का उल्लंघन करने के कारण एक वर्ष के लिए इंद्रप्रस्थ से निष्कासित करा दिया.

राज्य से एक वर्ष के लिए निष्कासित होने के पश्चात अर्जुन उत्तर-पूर्व भारत की ओर बढे. वहां उनकी भेट एक विधवा राजकुमारी नागिन से हुई .

अर्जुन उस नाग कन्या पर आकर्षित हो जाते है तथा दोनों एक दूसरे से विवाह कर लेते है. विवाह के कुछ समय पश्चात अर्जुन एवं उलूपी का एक पुत्र हुआ जिसका नाम उन्होंने अरावन रखा.

तिरुपति बालाजी से जुड़ा एक बहुत ही विचित्र रहस्य

जिसे जान आश्चर्यकित हो जाओगे आप !

वैंकटेश भगवान को कलियुग में बालाजी नाम से भी जाना गया है. पौराणिक गाथाओं और परम्पराओं से जु़डा संक्षिप्त इतिहास यहां प्रस्तुत है :-

प्रसिद्ध पौराणिक सागर-मंथन की गाथा के अनुसार जब सागर मंथन किया गया था तब कालकूट विष के अलावा चौदह रत्न निकले थे. इन रत्नों में से एक देवी लक्ष्मी भी थीं. लक्ष्मी के भव्य रूप और आकर्षण के फलस्वरूप सारे देवता, दैत्य और मनुष्य उनसे विवाह करने हेतु लालायित थे, किन्तु देवी लक्ष्मी को उन सबमें कोई न कोई कमी लगी. अत: उन्होंने समीप निरपेक्ष भाव से खड़े हुए विष्णुजी के गले में वरमाला पहना दी. विष्णु जी ने लक्ष्मी जी को अपने वक्ष पर स्थान दिया.

यह रहस्यपूर्ण है कि विष्णुजी ने लक्ष्मीजी को अपने ह्वदय में स्थान क्यों नहीं दिया? महादेव शिवजी की जिस प्रकार पत्नी अथवा अर्धाग्नि पार्वती हैं, किन्तु उन्होंने अपने ह्वदयरूपी मानसरोवर में राजहंस राम को बसा रखा था उसी समानांतर आधार पर विष्णु के ह्वदय में संसार के पालन हेतु उत्तरदायित्व छिपा था. उस उत्तरदायित्व में कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं हो इसलिए संभवतया लक्ष्मीजी का निवास वक्षस्थल बना.

एक बार धरती पर विश्व कल्याण हेतु यज्ञ का आयोजन किया गया. तब समस्या उठी कि यज्ञ का फल ब्रम्हा, विष्णु, महेश में से किसे अर्पित किया जाए. इनमें से सर्वाधिक उपयुक्त का चयन करने हेतु ऋषि भृगु को नियुक्त किया गया. भृगु ऋषि पहले ब्रम्हाजी और तत्पश्चात महेश के पास पहुंचे किन्तु उन्हें यज्ञ फल हेतु अनुपयुक्त पाया. अंत में वे विष्णुलोक पहुंचे.

कुरुक्षेत्र के मैदान में हुई थी एक और महाभारत

जो चली थी 18 दिन से भी ज्यादा ”अनोखा रहस्य” !

महाभारत के प्रसिद्ध पात्र एवं गंगा पुत्र भीष्म को परशुराम ने अस्त्रों शास्त्रों की विद्या दी थी. युद्ध में पारंगत भीष्म अजेय थे कोई भी उन्हें युद्ध की चुनौती देने से घबराता था.

एक दिन काशी राज्य के राजा ने अपनी पुत्रियों के विवाह के लिए स्वयम्बर का आयोजन किया. काशी नरेश के तीनो पुत्रिया अत्यधिक सुन्दर एवं गुणवान थी जिनका नाम अम्बा, अम्बिका एवं अम्बाला था. उनके स्वयंबर में बहुत दूर दूर से राजा महाराजा काशी नरेश पधारे.

शांतुन पुत्र भीष्म ने भी उस स्वयम्बर में हिस्सा लिया. क्योकि उस समय तक भीष्म काफी वृद्ध हो चले थे तो उन्हें देख लोगो समझने हसने लगे. वहां उपस्थित सभी लोग यह सोच रहे थे की भीष्म अपने विवाह के लिए यहाँ आये है. परन्तु वास्तविकता में भीष्म को अपने भाई विचित्रवीर्य के विवाह के लिए सुन्दर कन्या के तलाश थी.

स्वयम्बर में पधारे राजाओ के व्यवहारों से भीष्म पितामह को काफी आहत पहुंची तथा गुस्से में उन्होंने तीनो राजकुमारियों का हरण कर लिया. वहां आये राजा महाराजो ने उन्हें रोकने का प्रयास किया परन्तु अजेय भीष्म के आगे कोई भी नहीं टिक सका, सब को युद्ध में मुंह की खानी पड़ी.

तीनो राजकुमारियों को हरण कर भीष्म उन्हें हस्तिनापुर में लाये उन दिनों राजपूतो द्वारा राजकुमारियों के हरण कर शादी करने की प्रथा थी.

जब इन तीनों राजकुमारियों के विवाह की तैयारियाँ हो रही थीं तो राजकुमारी अम्बा इससे प्रसन्न नहीं थी. भीष्म के पूछने पर उसने कहा कि वह राजा शल्य से प्यार करती है. इसलिए विचित्रवीर्य से विवाह नहीं कर सकती.

एक ऐसी सत्य घटना जो आपको विवश करें देगी ”पुनर्जन्म” में विश्वास करने पर !

जिस किसी ने भी इस मृत्युलोक में जन्म लिया है, यह निश्चित है की एक ना एक दिन उसकी मृत्यु होनी है. यह हमारे जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है तथा प्रकृति का यह कानून है.

मृत्यु के बाद का क्या होता है इस सवाल का जवाब वर्षो से एक पहेली बना हुआ है.

वैज्ञानिक दृष्टि से अगर बात की जाए तो विज्ञान का मानना है की कोई भी मरने के बाद पुनः पैदा नहीं हो सकता .

लेकिन आज हम आपको जिस कहानी के बारे में बताने जा रहे वह विज्ञान की आँखों से आँख मिलाकर खड़ी है, जिसके सामने विज्ञान के सारे तर्क फीके पड़ते दिखाई देते है.

यह कहानी है शांति देवी की, वर्ष 1930 में दिल्ली में शांति का जन्म एक खुशहाल परिवार में बाबू बहादुर माथुर के यहाँ हुआ था. बचपन में उसका विकास अन्य समान्य बच्चों की तरह ही हो रहा था परन्तु जब वह चार साल की हुई उसने अजीब अजीब से बाते करनी शुरू कर दी.

उसने अपने माता पिता को पहचानने से इंकार कर दिया, उसका कहना था की अभी वह जा रह रही है यह उसका घर नहीं है वास्तव में उसका घर वहां से काफी दूर मथुरा में है जहां उसका पूरा परिवार रहता है.

उस मात्र चार साल की लड़की ने कहा की उसका नाम भी शान्ति देवी नहीं है बल्कि उसका वास्तविक नाम लुडगी देवी है.

उसके पति का नाम केदार नाथ चौबे है तथा उसे सब चौबाइन कह कर बुलाते थे. उसकी मौत बच्चे के जन्म के समय हुई थी.

क्यों किया था भगवान शिव ने श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का वध ?

भगवान श्री कृष्ण तथा उनके परम मित्र सुदामा दोनों अपनी मित्रता के लिए शास्त्रों में जाने जाते है. सरल तथा शांत स्वभाव वाले भगवान श्री कृष्ण के ह्रदय में गोकुलवासी सुदामा ने अपनी एक अलग सी छवि बनाई थी जिसे आज भी दुनिया मित्रता के प्रतिरूप में याद करती है.

परन्तु वाही भगवान श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का एक ऐसा रूप भी था जिसका स्वयं महादेव शिव ने वध किया था. माना इस तथ्य पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है परन्तु हिन्दू धर्म के पुराणों की कथा के अनुसार यह सच उभर कर आता है.

आखिर क्यों भगवान शिव को भगवान श्री कृष्ण के मित्र सुदामा का वध करना पड़ा आइये जानते है इस कथा के माध्यम से.

स्वर्ग के विशेष भाग गोलोक में सुदामा और विराजा नाम की एक कन्या निवास करती थी. विराजा को भगवान श्री कृष्ण से प्रेम था परन्तु सुदामा विराजा से प्रेम करने लगे.

एक बार विराजा भगवान श्री कृष्ण के आकर्षण में उनके पास चली गई, विराजा तथा भगवान श्री कृष्ण को राधा जी जब एक साथ देखा तो क्रोध में उन्होंने विराजा को श्राप दे दिया की वह गोलोक से पृथ्वीलोक में निवास करेगी. किसी कारणवश सुदामा को भी एक श्राप के कारण पृथ्वीलोक में जन्म लेना पड़ा.

क्यों करना पड़ा श्री कृष्ण को कर्ण का अंतिम संस्कार

कोंन थे दानवीर कर्ण जाने उनकी पूरी कहानी जनम से मृत्यु तक :-

महाभारत का युद्ध ( mahabharat yuddha )अधर्म पर धर्म की विजय को दर्शाता है जिसमे भगवान् श्री कृष्ण का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान था. जब दुर्योधन ने अपनी तरफ सेना मांगी तो श्री कृष्ण को पांडवो की तरफ होना पड़ा . महाभारत में कौरवों और पांडवो की सेना में अनेको योद्धा थे जिन्होंने युद्ध में विशेष भूमिका निभाई और वीरगति को प्राप्त हुए तथा अपना नाम सदा सदा के लिए महाभारत ग्रन्थ में लिख दिया.

इन्ही योद्धाओं में से एक था दानवीर कर्ण जो कौरवों की तरफ से लड़े और वीरगति को प्राप्त हुए लेकिन आज हम आपको कुछ दानवीर कर्ण के बारे में कुछ ऐसी बातें बताएँगे जो सायद ही आपने पहले कभी सुनी होंगी.

आप सब जानते है की कर्ण के पिता सूर्य और माता कुंती थी और पांडवो के ज्येष्ठ भ्राता थे, पर उनका पालन एक रथ चलाने वाले ने किया था, इसलिए वो सूतपुत्र कहलाएं और इसी कारण उन्हें वो समाज में कभी सम्मान नहीं मिला, जिसके वो अधिकारी थे। इस लेख में आज हम महारथी कर्ण से सम्बंधित कुछ रोचक बातें जानेंगे।

कर्ण के वध में भगवान् श्री कृष्ण का बहुत योगदान था जिन्होंने अर्जुन को कर्ण वध का रास्ता सुझाया. भगवान् श्री कृष्ण जानते थे की कर्ण बहुत ही दानवीर योद्धा थे लेकिन जब कर्ण मृत्युशैया पर थे तब कृष्ण उनके पास उनके दानवीर होने की परीक्षा लेने के लिए आए। कर्ण ने कृष्ण को कहा कि उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। ऐसे में कृष्ण ने उनसे उनका सोने का दांत मांग लिया।

कर्ण ने अपने समीप पड़े पत्थर को उठाया और उससे अपना दांत तोड़कर कृष्ण को दे दिया। कर्ण ने एक बार फिर अपने दानवीर होने का प्रमाण दिया जिससे कृष्ण काफी प्रभावित हुए। कृष्ण ने कर्ण से कहा कि वह उनसे कोई भी वरदान मांग़ सकते हैं।

कर्ण ने कृष्ण से कहा कि एक निर्धन सूत पुत्र होने की वजह से उनके साथ बहुत छल हुए हैं और पूरी जिंदगी मुझे हालत के साथ समझौता करना पड़ा. इसीलिए अगली बार जब कृष्ण धरती पर आएं तो वह पिछड़े वर्ग के लोगों के जीवन को सुधारने के लिए प्रयत्न करें. इसके साथ कर्ण ने दो और वरदान मांगे.

दूसरे वरदान के रूप में कर्ण ने यह मांगा कि अगले जन्म में कृष्ण उन्हीं के राज्य में जन्म लें और तीसरे वरदान में उन्होंने कृष्ण से कहा कि उनका अंतिम संस्कार ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहां कोई पाप ना हो।