क्या है सपनो का मतलब और क्या मिलेगा उनका फल…

हर सपनो का मतलब और फल होता है सपने दो तरह के होते है एक वो जो हम सोने के बाद गहरी नींद में देखते है दूसरा वो जो हम अपने सुनहरे भविष्य के लिए सोचते है
सपने वो है जो हकीकत नही होते, बल्कि एक सोहच है जो हम चाहते है की हमे भविष्य में मिल जाये जो अक्सर जो सपने हम नींद में देखते है वो कहीं न कहीं हमारे जीवन से जुड़े हुए होते है
सपने में हम कई बार ऐसी घटना देखते है जो हमारे भूतकाल से या भविष्यकाल से जुडी हुई होती है कई बार हम अपने जीवन में जैसी सोच रखते है जैसे माहौल में रहते है अक्सर वही हमे सपने में दिखाई देता है एक बात और है की सपने हमेशा अधूरे नही रहते वे कई बार पुरे भी होते है कभी कभी तो सपने तुरंत पुरे हो जाते है और कई बार थोड़े समय बाद अपना रंग दिखाते है ज्योतिषशास्त्र के अनुसार हर सपने का कोई न कोई मतलब या अर्थ होता है | सपने हमारे आने वाले भविष्य का आइना है वो हमे आने वाली मुसीबतो के लिए पहले से चेतावनी देते है
कहते है अक्सर सुबह का देखा हुआ सपना सच होता है | कह तो नहीं सकता की इस बात में कितनी सच्चाई है लेकिन सपने में देखी हर चीज़ वस्तु , इंसान , जानवर , घटना का कोई न कोई मतलब जरूर होता है घटना को समझ क्र हम जितने से उसका मतलब जानेंगे तब हम अपने अंदर की भावनाये जान पाएंगे | याद रखे की आपके सपनो को आपसे बेहतर कोई नही समझ सकता |
अगर आपको आपके सपनो का मतलब समझना है तो आपको ये याद रखना होगा की अपने सपने में क्या देखा | कई लोगो के साथ ये समस्या है की उनको ये याद ही नही रहता कि उन्होंने अपने सपने में क्या देखा सुबह होते ही सपने को भूल जाते है

सपनो का मतलब और उनका फल

# सपने में किसी जानवर का दिखाई देना

* कुत्ता -सपनो में कुत्ता अलग अलग अवस्था में दिखाई देता है| अगर कुत्ता रोटा हुआ दिखाई दे तो बुरा समाचार आने वाला है और यदि सिर्फ कुत्ता दिखाई दे तो इसका मतलब है कि किसी पुराने दोस्त से मिलने वाले है |

*बिल्ली- सपने में बिल्ली का दिखाई देना इसका मतलब किसी से आपकी लड़ाई होने वाली है |

*शेर – सपने में शेर का दिखाई देना मतलब कि आपके रुके हुए कार्य पूर्ण होने वाले है और मुक़दमे में जीत मिलेगी| और आपके सभी शत्रु आपसे हमेशा डर क्र रहेंगे और हर छेत्र में आपको विजय प्राप्त होगी | शेर शेरनी के जोड़े को एक बार देखने का मतलब है कि आपका शादी शुदा जीवन खुशहाल रहेगा |

*गाय – अलग अलग तरह कि गाय के दिखने का अलग अलग मतलब होता है यदि आपके सपने में सफ़ेद गाय मिले तो इसका मतलब है कि आपको शक्कर और चांदी के व्यापार में लाभ मिलेगा | और चितकबरी गाय दिखे तो आपको ब्याज के व्यपार में लाभ मिलेगा |यदि आप सपने में आप गाय का दूध निकलता हुआ देखते है तो संपत्ति और व्यापार में लाभ मिलेगा |

*नाग- बहुत लोगो को अपने सपनो में नाग नजर आते है और वे सपने में नाग को देख कर दर जाते है और उन्हें ये लगता है कि इस सपने का कुछ गलत महत्व है लेकिन ऐसा नही है | सांप या नाग देखना शुभ होता है इसका मतलब है कि आपके जीवन में सभी तरह कि सुख समृद्धि आएगी |

*मछली – मछली को लक्ष्मी माँ का सूचक मानते है | इसके दिखने का मतलब है कि आपको धन कि प्राप्ति होगी |

*हाथी – हाथी का सपने में दिखाई देना एक अच्छा संकेत है | हाथी को अलग तरह से देखा जा सकता है जिसके अलग अलग तरह के फायदे होते है | खड़े हुए हाथी को देखना इसका मतलब कि आपके किसी काम में बाधा आ सकती है और यदि आपने अपने आपको सपने में हाथी कि सवारी करते हुए देखा है तो आपके जीवन में सुख समृद्धि आएगी | अगर अपने हठी हथिनी के जोडे को देखना मतलब आपकी शादीधूदा ज़िन्दगी खुशाल बानी रहेगी |

*नेवला- किसी शत्रु का जो आपके मन में है , वो जल्दी ही दूर हो जाएगा |

*लोमड़ी- आपके बहुत अच्चे दोस्त से आपको धोखा मिलने वाला है |

#सपने में किसी कीडे को देखने का मतलब

*छिपकली- सपने में छिपकली का दिखना बहुत ही अशुभ मन जाता है | आपको सपने में छिपकली किस तरह दिखाई दे रही है इस बात में उसका रहस्य छुपा हुआ है | अगर कोई छिपकली एक ही जगह पर बैठी हुई है तो इसका मतलब कोई दुर्घटना या हानि होने वाली है | छिपकली कीडे मकोडे खाते हुए दिखाई देती है तो इसका मतलब घर में या असपास चोरी हो सकती है | लेकिन अगर छिपकली डर कर भगति हुई दिखाई देती है तो यह शुभ संकेत हो सकता है |

*बिच्छू- बिच्छू का दिखना शुभ अशुभ दोनों माना जाता है | यह परिस्तिथियो पर निर्भर करता है |अगर आपको बिच्छू सपने में दिखाई दिया तो समझिये कि आपके ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आने वाली है , जिससे आपका मान सम्मान बढेगा | साथ ही आपको आपके सभी कार्यो में सफलता प्राप्त होगी | सपनो में बिच्छू अगर काटता दिखाई दे तो किसी तरह कि हानि संभव है | कला बिच्छू शुभ और सफ़ेद बिच्छू अशुभ होता है |

* जुगनू – आपके जीवन में कठिन समय आने वाला है |

* टिड्डे _ आपको व्यापार में हानि होगी |

* मधुमख्खी- यदि सपने में मधुमख्खी से भरा हुआ छत्ता दिखाई दे तो यह शुभ संकेत है इससे आपके परिवार में एक जुटता बानी रहेगी | और यदि मधुमख्खी फूल पर बैठी दिखाई देती है तो आपके व्यापार में हानि भी हो सकती है |

#सपने में रिश्तेदारो का या सगी संबंधियों का दिखाई देना

*दादा दादी , और नाना नानी – इनका दिखाई देने का मतलब घर के बुजुर्गो का आशीर्वाद और प्यार है |

*माता पिता – आपको आपके कार्यक्षेत्र में सम्मान मिलेगा |

*रिश्तेदार – सपने में किसी रिश्तेदार का घर में आता हुआ देखना इसका मतलब है कि आपको जल्द ही नए और अच्चे अवसर मिलने वाले है |

*भाई – आपके नए मित्र बन सकते है |

*पति- सपने में पति को देखना अच्छा सूचक है , इससे आपका रिश्ता मजबूत होगा और बहुत साडी खुशिया आपके जीवन में दस्तक देंगी |

*टीचर- अपने गुरु का सपने में दिखाई देना एक शुभ संकेत है इसका मतलब है आपको जीवन में सफलता प्राप्त होगी |

#सपने में किसी कि मृत्यु दिखना या किसी मर चुके इंसान को देखना

*किसी मर चुके इंसान का दिखना – कोई आपका अपना या आपका रिश्तेदार जो मर चुका है,उससे आप सपने में बात क्र रहे है इसका मतलब है कि आपके मन कि कोई इच्छा पूरी होने वाली है |

*मृत्यु- अपनी या किसी और कि मृत्यु का देखने का मतलब है कि आपके जीवन में जो भी परेशानिया चल रही है वो सब खत्म होने वाली है और एक नयी शुरुवात होने वाली है और किसी मुरदे का दिखना इसका मतलब है कि आपकी मन कि कोई इच्छा पूरी होने वाली है |

*आत्महत्या – आत्महत्या इस बात का प्रतिक है जो बात आपके जीवन में महत्वपूर्ण नहीं है और आपकी सहनशीलता से बहार है उसे अपने जीवन से बहार निकाल दो |

*भूत- सपने में भूत देखने का मतलब है कि आपको किसी तरह के भरी नुक्सान को झेलना पड़ेगा |

*हत्या – ये अशुभ संकेत है इसका मतलब है कि आपको आपके किसी अपने ही बहुत बड़ा धोखा मिलने वाला है |

*अर्थी- रोगियों को ये दिखाई दे तो ये अच्छा माना जाता है इससे उनके ठीक होने कि आशंका ज्यादा होती है |

मनकामेश्वर मंदिर -इस मंदिर में स्वयं शिव जी ने की थी अपने शिवलिंग की स्थापना |

आगरा में स्थित मनकामेश्वर मंदिर उन प्राचीन मंदिरो में से एक है जो भगवन शिव को समर्पित है ये मंदिर आगरा रेलवे स्टेशन के निकट स्तिथ है मंदिर में स्तिथ भगवन शिव की शिवलिंग को चाँदी की परत से ढका गया है कहा जाता है की इस मंदिर की स्थापना भगवान् शिव ने स्वयंम की थी जब द्वापर युग में भगवान् शिव ने जन्म लिया था जब भगवान् शिव जी श्री कृष्ण जी के दर्शन के लिए हिमालय से मथुरा जा रहे थे तो उन्होंने यहाँ विश्राम किया था शिव जी ने मनकामेश्वर म तपस्या की थी और एक रात के लिए विश्राम किया था और उन्होंने कहा था की अगर में श्री कृष्ण जी को गोदी में खिलने में सफल हो जाऊंगा तो यहाँ एक शिवलिंग की स्थापना करूँगा अगले दिन जब शिवजी मथुरा गए तो यशोदा माँ ने उनका रूप देखते ही श्री कृष्ण जी से मिलने से मन कर दिया और कहा की मेरा लल्ला यानि की श्री कृष्णजी आपका ये रूप देख कर डर जाएंगे | श्री कृष्ण जी भी ठहरे नटखट उन्होंने यह दृश्य देख कर अपनी लीला प्रारम्भ कर दी और रोना शुरू कर दिया और रोते रोते उन्होंने शिव जी की तरफ इशारा किया जो बरगत के पेड़ के नीचे समाधी की अवस्था में बैठे हुए थे | कृष्ण जी को ऐसे रोटा देख माँ यशोदा ने शिव जी को बुलाया और कहा की आप मेरे पुत्र को अपना आशिर्वाद दे सकते है | गोकुल से लौटते समय शिव जी यहाँ वापस आये और अपने लिंग (शिवलिंग) स्वरुप की स्थापना की | इस तरह उन्होंने कहा की यहाँ मेरी सभी इच्छाये पूर्ण हो गयी है भविष्य में जो भी अपनी मनोकामनाये लेकर आएगा ये लिंग स्वरुप उन सभी की मनोकामनाये पूर्ण करेगा तभी से इस शिवलिंग का नाम मनकामेश्वर पड़ गया | ये मंदिर अपनेआप में बहुत अनोखा है क्योंकि यहाँ स्तिथ शिवलिंग को चांदी से ढका गया है
मनकामेश्वर मंदिर के केंद्र में एक गर्भगृह है जहाँ शिव जी की प्रतिमा को स्थापित किया गया है और साथ ही उनके पूर्ण परिवार की भी प्रतिमा है| नीचे जाने के लिए सीढ़ियां है जो भक्त स्थापित मूर्तियों का दर्शन करना चाहते है तो उन्हें इन सीढ़ियों को पर करना पड़ता है | भक्तो को और पर्यटको को भगवान् शिव की मूर्ति के समीप जाने की अनुमति है पर वो केवल एक ही शर्त पर संभव है जब पर्यटको ने कोई भी अंग्रेजी प्रकार का वस्त्र धारण नहीं किया हो और उनके पास किसी प्रकार की चमडे की वस्तु न हो और वह स्वच्छ हों |

कुछ वर्ष पूर्व २४ जुलाई २००४ को , मथुरा के श्री द्वारकाधीश मंदिर के मुखिया श्री नाना जी भाई ने इस मंदिर में कृष्ण जी के श्री नाथ जी के स्वरुप की स्थापना करवाई |
श्रीनाथ जी का स्वरुप अति मधुराष्टकं और बहुत ही अनोखा है और देखने में तो बहुत ही आकर्षक लगता है |

मुख्य गर्भगृह के पीछे कई छोटे छोटे मंदिर है जो की मुख्या मंदिर परिसर में भीतर स्तिथ है | ये सभी मंदिर भिन्न भिन्न देवी देवताओ को समर्पित है जैसे – माता गंगा , माता सरस्वती , माता गायत्री ,कैला देवी ,भगवान् रामचंद्र जी , भगवान् कृष्ण , भगवान् नरसिंह जी, भगण विष्णु जी.

इस शिवलिंग के प्रसिद्ध होने का यही मुख्य कारण है की श्री मनकामेश्वर जी के रूप में शिवजी स्वयंम भक्तो की सभी इच्छाये पूर्ण करते है | मंदिर में देसी घी से प्रज्वलित की जाने वाली ११ अखंड ज्योतियाँ २४ घंटे प्रज्वलित रहती है | इच्छा पूर्ण होने के पश्चात भक्त दुबारा मनकामेश्वर मंदिर म आते है और एक एड दीप प्रज्वलित करते है
मनकामेश्वर मंदिर में एक विशेष प्रकार का पान भी मिलता है जो केवल इसी मंदिर में पाया जाता है | इन पाँव को फोल्ड और दुबारा फोल्ड कुछ इस तरह किया जाता है कि पान देखने में एक पिरामिड जैसा लगता है फिर इन पाँव को चांदी के वरक से ढका जाता है और अंत में इस पान के ऊपर गोले का पाउडर छिड़क जाता है जो खाने के साथ साथ देखने में भी बहुत ही स्वादिष्ट लगता है |

श्री नाथ जी के दर्शन करने का समय
गर्मियों में श्रीनाथ जी के मंगल दर्शन का समय प्रातः ६;३० से ६;४५ तक है | श्रृंगार दर्शन करने का समय सुबह ८:३० से १०:३० तक है और राजभोग दर्शन करने का समय सुबह ११:३० से १२:०० बजे तक है | उत्थापन का समय ५:३० बजे से ६:३० बजे तक और संध्या दर्शन का समय शाम ७;०० से रात ९:०० बजे तक है |जबकि सर्दियों के दौरान इन समय में कुछ बदलाव क्र दिए जाते है जिनके मुताबिक सर्दियों में मंगल दर्शन करने का समय प्रातः ६:४५ से ७:०० बजे तक है | श्रृंगार दर्शन करने का समय सुबह ९:०० बजे से १०:३० बजे तक होता है | राजभोग दर्शन करने का समय १०:३० बजे से दोपहर १२:०० बझे तक होता है |उत्थापन का समय शाम ५:१५ से ६:१५ बजे तक होता है और संध्या दर्शन का समय शाम ६:४५ से ८:३० बजे तक तक होता है

मनकामेश्वर मंदिर तक कैसे पहुचें
मनकामेश्वर मंदिर आगरा रेलवे स्टेटीन के बोहोत नजदीक है | यहाँ तक पहुचने के लिए सबसे पहले ४०० मीटर तक sh 39/ah 43 दक्षिण पश्चिम में जाइये और इसके बाद बाएं दिशा में स्तिथ पार्क के साथ चलते रहें |सबसे पास वाले घुमाव पर चौथा exist लें और ६०० मीटर कि ड्राइविंग के बाद मंटोला रोड कि तरफ बायीं और जाये| मंटोला रोड पर २८० मीटर कि ड्राइविंग में बायीं तरफ से ग्लोब शेयर मार्किट को पर करने के बाद सदर भट्टी रोड पर ४०० मीटर तक चलते रहे और बाएं मुडे आपके फिर दाएं मुडे आपके सामने मनकामेश्वर मंदिर होगा |

महादेवी अक्का – देवो के देव महादेव की दीवानी – एक अनोखी कहानी

अक्का महादेवी शिव भक्त थीं। शिव को वह अपने पति के रूप में देखती थीं। बचपन से ही उन्होंने अपने आप को पूरी तरह से शिव के प्रति समर्पित कर दिया था।

जब वह युवा हुईं तो एक राजा की नजर उन पर पड़ी। वह इतनी खूबसूरत थीं कि राजा ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। राजा ने उन्हें धमकाया – अगर तुम मुझसे विवाह नहीं करोगी, तो मैं तुम्‍हारे माता पिता को मार डालूंगा। डरकर उन्होंने उससे शादी कर ली, लेकिन उसे शारीरिक रूप से दूर ही रखा।

राजा उनसे कई तरीकों से प्रेम निवेदन करता रहा, लेकिन हर बार वह एक ही बात कहतीं – मेरी शादी तो बहुत पहले शिव के साथ हो चुकी है। यह अक्का का कोई भ्रम नहीं था, यह उनके लिए शत प्रतिशत सच्ची बात थी।

राजा ने उन्हें धमकाया – अगर तुम मुझसे विवाह नहीं करोगी, तो मैं तुम्‍हारे माता पिता को मार डालूंगा। डरकर उन्होंने उससे शादी कर ली, लेकिन उसे शारीरिक रूप से दूर ही रखा।

विवाह का मतलब होता है कि आप अपना शरीर, मन, और भावनाएं अपने जीवन-साथी को सौंप देते हैं। इस संदर्भ में आज भी ऐसे बहुत से संप्रदाय हैं, जो इस तरह की

बातों को निभा रहे हैं। विधिवत ईसाई नन बनने से पहले लड़कियां जीसस से विवाह करती हैं। आखिरकार एक इंसान शरीर, दिमाग और भावनाएं ही तो है।
ऊर्जाओं का अनुभव तो इंसान को उतना नहीं हो पाता। अगर आप खुद को किसी चीज के प्रति प्रतिबद्ध करना चाहते हैं, तो शरीर, दिमाग और भावों को समर्पित किए बिना प्रतिबद्धता नहीं हो सकती। मीराबाई और ऐसे दूसरे भक्तों में यह पहलू शरीर, मस्तिष्क और भावों के भी आगे एक पूर्णत: अलग स्तर तक पहुंच गया था और पूरी तरह से वास्तविक बन गया था। आप केवल कुछ प्रसिद्ध भक्तों के बारे में जानते हैं, लेकिन ऐसे बहुत सारे भक्त हुए हैं जो गुमनाम हैं और जो इस अवस्था में पहुंच चुके थे।

अक्का महादेवी के लिए भी यह सब वास्तविक था। उनके लिए यह कोई कल्पना नहीं थी, यह शत प्रतिशत सच था।
अक्का महादेवी का यह कहना कि उनकी शादी पहले ही शिव से हो चुकी है, राजा को सहन नहीं हुआ। तो एक दिन राजा ने सोचा कि ऐसी पत्नी को रखने का कोई

मतलब नहीं है। ऐसी पत्नी के साथ भला कोई कैसे रह सकता है जिसने किसी अदृश्य व अनजाने व्यक्ति से विवाह किया हुआ है। उन दिनों औपचारिक रूप से तलाक नहीं होते थे। पर राजा परेशान रहने लगा। उसे समझ नही आ रहा था कि वह क्या करे। उसने अक्का को अपनी राजसभा में बुलाया और राजसभा से फैसला करने को कहा।

जब सभा में अक्का से पूछा गया तो वह यही कहती रहीं कि उनके पति कहीं और हैं।
राजा को गुस्सा आ गया क्योंकि इतने सारे लोगों के सामने उसकी पत्नी कह रही थी कि उसका पति कहीं और है। आठ सौ साल पहले किसी राजा के लिए यह सहन करना कोई आसान बात नहीं थी। समाज में ऐसी बातों का सामना करना आसान नहीं था। राजा ने कहा, ‘अगर तुम्‍हारा विवाह किसी और के साथ हो चुका है तो तुम मेरे साथ क्या कर रही हो? चली जाओ।’ अक्का ने कहा, ‘ठीक है’ और वहां से चल पड़ीं। भारत में उन दिनों किसी महिला के लिए यह सोचना भी दुश्वार था कि वह हमेशा के लिए अपने पति का घर छोडक़र जा सकती है, लेकिन अक्का वहां से चल पड़ीं।

अक्का जब बिना किसी परेशानी के निसंकोच राजा को छोड़ क्र जाने लगी तो राजा के मन में नीचता आ गयी और उसने अक्का से कहा की जो सब कुछ तुमने पहन रखा है कपरे गहने सब मेरा है सब कुछ यही छोड़ दो तब जाओ . लोगो से भरी राज्यसभा में उस अठ्ठारह वर्ष की युवती अक्का महादेवी ने अपने गहने यहाँ तक की वस्त्र भी उत्तर दिए और निर्वस्त्र ही वह से चल दी|

उस दिन के बाद से उन्होंने वस्त्र पहनने से इनकार कर दिया |बोहोत लोगो ने उन्हें समझने की कोशिश की के उन्हें वस्त्र पहनने चाहिए वह एक स्त्री है इससे उन्हें परेशानी हो सकती है लेकिन उन्होंने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जीवन भर वह निर्वस्त्र ही रहीं | महादेवी अक्का की मृत्यु कम उम्र में ही हो गया था

लेकिन उन्होंने बहुत ही छोटे जीवन काल में शिव और उनके प्रति अपनी भक्ति पर बहुत सी खूबसूरत कवितायेँ लिखीं

वह अपने प्रभु से हमेशा यही कहती थी कि हे शिव मुझे आज भोजन न मिले क्योंकि में आपमें समाहित होने के लिए जिस तरह तड़प से गुजर रहीं हु वह तड़प और पीड़ा मेरे शरीर हो भी महसूस हो| और यदि मैं भोजन के लुंगी तो मेरा शरीर संतुष्ट हो जाएगा और मेरा शरीर कैसे जानेगा कि मैं क्या महसूस क्र रहीं हूँ इसलिए मैं चाहती हूं कि मुझे भोजन ही न मिले। अगर मेरे हाथ में भोजन आए भी तो इससे पहले कि मैं उसे खाऊं, वह जमीन पर गिर जाए। अगर यह जमीन पर गिर गया तो मेरे जैसी मूर्ख उसे उठाकर खा सकती है इसलिए इससे पहले कि गिरे हुए भोजन को मैं उठाकर खाऊं, कोई कुत्ता आए और उसे ले जाए।” यह उनकी रोजाना की प्रार्थना थी।
भक्त पूरी तरह से अलग प्राणी होते हैं। एक सच्चा भक्त सामाजिक ताने-बाने में फिट नहीं बैठता, इसलिए ऐसे लोग हमेशा समाज से अलग रहते हैं।

कुछ भक्त अपने अलग तौर-तरीकों के बावजूद भी किसी तरह समाज में स्वीकार कर लिए जाते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग गुमनामी में कहीं खो जाते हैं या कई बार ऐसा भी होता है कि उन्हें मार दिया जाता है। कई दूसरी सभ्‍यताओं और देशों में ऐसे लोगों की हत्या कर दी जाती है, लेकिन भारत में कम से कम ऐसा नहीं होता। भक्त इस दुनिया के नहीं होते, उनका केवल भौतिक शरीर यहां होता है। उनके जीने का तरीका और वह शक्ति, जो उनके पास होती है, पूरी तरह से किसी दूसरे लोक की होती है।

हनुमान जी के जन्म स्थान के रहस्य का खुलासा

भगवान हनुमान के जन्म स्थान को लेकर शुरुआत से ही विवाद रहा है.

रामायण में भी इनके जन्म स्थान का कहीं विश्वसनीय जिक्र नहीं है. कोई कहता है कि हनुमान का जन्म स्थान नागपुर में है तो कोई कर्नाटक के कोप्पल को हनुमान का जन्म स्थान मानता है.

तो आइये आज हम आपको बताते हैं कि आखिर हनुमान का जन्म स्थान कहाँ हैं-

पहले किष्किन्धा को जान लीजिये-

कर्नाटक के कोप्पल और बेल्लारी में एक जगह है जो अंजनी पर्वत के नाम से विख्यात है. इस जगह को किष्किन्धा भी बोला जाता है. यह अंजनी पर्वत इसीलिए ज्यादा मशहूर है क्योकि यहाँ हनुमान जी की माता जी ने हनुमान जन्म के लिए तपस्या की थी. अब जानकार लोग बताते हैं कि यह हनुमान का जन्म स्थान इसीलिए है क्योकि माता अंजनी जी ने यहाँ ही भगवान के जन्म की नींव रखी थी. किन्तु यह स्थान हनुमान का जन्म स्थान नहीं है.

तो यहाँ हुआ है हनुमान जन्म-

बड़े दुःख की बात है कि हनुमान का जन्म स्थान आज गुमनामी में दफ़न हो रहा है. झारखंड के गुमला जिला के पास एक पर्वत है जिसे हनुमान का जन्म स्थान बताया गया है. गुमले जिले से यह पर्वत कुछ 21 किमी दूर है इसे आंजन धाम बोला जाता है. गाँव का नाम ही आंजन है जो माता अंजनी के नाम पर रखा गया है. पर्वत के नीचे एक बड़ी गुफा है और बोला जाता है कि यहाँ पर हनुमान का जन्म हुआ है. माता अंजनी जी यहीं पर निवास करती थीं.

आप अगर यहाँ हनुमान जन्म के सबूत खोजना शुरू करेंगे तो आपको एक नहीं कई सबूत प्राप्त हो जायेंगे.

पहला सबूत है कि ऐसा बताया जाता है कि हनुमान जन्म से पहले माता अंजनी काफी सारे शिवलिंग की पूजा किया करती थीं. यह शिवलिंग नदी में स्थापित बताये जाते थे. आप अंजनी माता का इतिहास जब पढेंगे तो आपको इस तरह की जानकारी प्राप्त हो पायेगी. जब आप झारखण्ड के इस मंदिर में आते हैं तो आप देखेंगे कि गुफा के पास जो नदी है, वहां पर प्राचीन समय के कुछ 300 शिवलिंग मौजूद हैं.

माता अंजनी की गोद में हैं हनुमान-

यहाँ पर जो मंदिर है उसकी यही सबसे बड़ी खासियत है कि इस मंदिर में माता अंजनी की गोद में हनुमान हैं.

हनुमान का जन्म स्थान

आज भी यहाँ कई साधू छुपकर तपस्या कर रहे हैं. गुफा की रखवाली एक सर्प कर रहा है. यह सर्प लोगों को गुफा के अन्दर जाने से रोकता है. वैसे यह गुफा आज बंद है. ऐसा कहा जाता है कि यहाँ के आदिवासी लोगों ने एक बार माता को बकरे की बली दे दी थी इस बात से माता अंजनी क्रोधित हो गयी थीं. तभी से यह गुफा बंद है ऐसा बताया जाता है.

हनुमान का जन्म स्थान

आप यदि कभी यहाँ जाते हैं तो इस जगह की सकारात्मक शक्ति को महसूस करते ही समझ जायेंगे कि यह जगह कोई आम जगह नहीं है.

किन्तु दुःख इस बात का है कि हनुमान की इस जन्म स्थली की स्थिति वाकई दयनीय हो गयी है.

गणपति बप्पा की ये प्रतिमा दिखने में बहुत छोटी है लेकिन इसकी कीमत है 600 करोड़ !

आज हम आपको बताएंगे गणपति बप्पा की एक खास प्रतिमा के बारे में जिसके बारे में जानकर आपके होश फ़ाख्ता हो जाएंगे.

हम जिस प्रतिमा का ज़िक्र कर रहे हैं वो आकार में काफी छोटी दिखाई देती है लेकिन उसकी कीमत 600 करोड़ रुपये है.

अब आप सोच रहे होंगे कि बप्पा की इस छोटी सी प्रतिमा की कीमत आखिर इतनी मोटी क्यों है.

आइए आपको रूबरू कराते हैं इस प्रतिमा से.

हीरे के गणपति

सूरत में रहनेवाले हीरा व्यवसायी कनूभाई आसोदरिया के घर में ये हीरे के गणपति की ये छोटी सी प्रतिमा स्थापित है. बप्पा की ये प्रतिमा खालिस हीरे की है, जिसकी कीमत करीब 600 करोड़ रुपए बताई जा रही है.

गणेशजी की आकृति वाला यह हीरा दुनिया का अनोखा हीरा है. इस कच्चे हीरे का वजन 182.3 कैरेट है और इसका वजन 36.50 ग्राम है.

कच्चे हीरे की खेप से मिली थी ये प्रतिमा

बताया जाता है कि इस कारोबारी को यह हीरे की प्रतिमा करीब 14 साल पहले बेल्जियम से आए कच्चे हीरे की खेप में मिली थी. अनकट हीरे की इस खेप में हीरे के गणपति की प्रतिमा को देखकर लोग चौंक गए थे.

हालांकि दुनियाभर से लोगों ने भगवान गणेश की इस अद्भुत प्रतिमा को खरीदने के लिए बोली भी लगाई, लेकिन उन्होंने हीरे के गणपति इस प्रतिमा को बेचने से इंकार कर दिया.

आज भी ये हीरे के गणपति की प्रतिमा सूरत के इस व्यवसायी के घर पर स्थापित है लेकिन सुरक्षा के मद्देनज़र हीरे के गणपति के दर्शन करने का सौभाग्य महज़ कुछ ही लोगों को मिल पाता है.

गौरतलब है कि कच्चे हीरे के खेप से निकले गणपति बप्पा की इस प्रतिमा से व्यवसायी और उसके पूरे परिवार की आस्था जुड़ी हुई है इसलिए सभी मिलकर बप्पा की सेवा करते हैं

इस मंदिर का सातवां दरवाज़ा खुला तो आ सकता है प्रलय हो जाएगा विनाश.. अब तक छः दरवाजे खुल चुके हैं

हर प्राचीन मंदिर रहस्यों और दिलचस्प कहानी से जुड़ा रहता है.

एक मंदिर ऐसा भी है, जिससे कई रहस्य जुड़े हुए है और उन रहस्यों के साथ कुछ मान्यताएं भी जुड़ी हुई है. उन मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का सातवा यानी आखरी दरवाजा खुलते ही प्रलय आ सकता है

यह मंदिर केरल राज्य के तिरुवनन्तपुरम में स्थापित है.
इस मंदिर को पद्मनाभस्वामी मंदिर के नाम से जाना जाता है.
यह मंदिर भगवान विष्णु को पूर्णरूप से समर्पित किया गया है.
भगवान विष्णु की प्रतिमा इस मंदिर के गर्भगृह में स्थापित की गई है.
भगवान विष्णु शेषनाग के ऊपर शयन अवस्था में विराजमान है .
इस मंदिर की दिलचस्प बात यह है कि इस मंदिर से जुड़े अनेक रहस्य है.
यह दुनिया का सबसे धनी मंदिर भी माना जाता है.
इस मंदिर की कुल संपत्ति लगभग 1,32,000 करोड़ है.
त्रावणकोर में 1947 तक राजाओं का शासन काल चलता था. भारत आज़ाद होने के बाद इसको भारत में मिलाया गया था.
विलय के पश्चात् भी भारत सरकार द्वारा इस धनी मंदिर पर अधिकार नहीं जमाया गया था. त्रावणकोर का यह मंदिर यहाँ के शाही परिवार के हाथो में ही था.
मंदिर की देखभाल व अन्य बाकी व्यवस्था यह शाही परिवार एक निजी संस्था के माध्यम से करवाते है.
इस मंदिर की संपत्ति को देखते हुए और रहस्य को सुनकर इस मंदिर के दरवाज़े खोलने की मांग जनता द्वारा की जाने लगी.
जनता की मांग को सुनकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा 7 सदस्यों की देखरेख में 6 द्वार खोल दिए गए.
इन 6 द्वार के अंदर से लगभग 1,32,000 करोड़ के सोने के जेवर और संपत्ति निकली है.
इस मंदिर की सबसे रहस्यमय चीज यहाँ का सातवा दरवाजा है. जिसको खोलने और ना खोलने पर विचार विमर्श हो रहा है.
यह मंदिर का सातवाँ दरवाज़ा इसलिए रहस्यमय बना हुआ है, क्योंकि मान्यताओं के अनुसार इसके खुलने पर प्रलय आने की बात कही जाती है.
इस सातवें द्वार पर किसी तरह की कुंडी या नट वोल्ट नहीं लगा है.
इस दरवाजे पर सिर्फ दो सर्पों का प्रतिबिंब बना हुआ है, जिसको इस द्वार का रक्षक बताया जाता है. यही दोनों सर्प इस द्वारा पर पहरा देते हैं और रक्षा करते हैं.
इस द्वार की विशेषता यहाँ है कि यह द्वार सिर्फ मंत्रोच्चारण से खुल सकता है. उसके अलावा इसको खोलने का और कोई रास्ता नहीं है.
इस द्वार को खोलने के लिए ‘गरुड़ मंत्र’ का प्रयोग स्पष्ट व साफ़ शब्दों में किसी सिद्ध पुरूष के माध्यम से कराना होगा.
मंत्रोच्चारण साफ़ और स्पष्ट न होने पर उस पुरुष की मृत्यु भी हो सकती है.
त्रावणकोर राजपरिवार के मुखिया तिरुनल मार्तंड वर्मा जो 90 वर्ष के है. उन्होंने एक अंग्रेज़ी समाचार पत्र में दिए गए साक्षात्कार में कहा है कि उनका पूरा जीवन इस मंदिर की देखभाल में बिता है.
साथ ही सातवें द्वार को खोले जाने पर देश में प्रलय आ सकता है. इसलिए इस द्वार को ना खोलें. इसका रहस्य रहस्य ही बना रहने देना सही है.
ज्यादातर प्राचीन चीजो का निर्माण रहस्यमय तरीकों से करवाया जाता था और उन वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए उससे मंत्रो से बांधकर रखा जाता था, ताकि उसका रहस्य बना रहे और उस जगह से जुड़ी वस्तुओं का दुरूपयोग न हो.

ऐसे में सातवे द्वार के अंदर की चीजें जानने की इच्छा सबको है, लेकिन अगर किसी चीज को तांत्रिक शक्ति व सिद्ध मंत्रों द्वारा रहस्यमय ढंग से बंद करके रखा गया है तो उससे छेड़खानी करना अनुचित ही होगा.

मंदिर का सातवाँ दरवाज़ा अगर बंद है, तो किसी का अहित नहीं हो रहा. लेकिन मंदिर का सातवाँ दरवाज़ा खुलने पर अहित होने की संभावना है. इसलिए इसको बंद रखना ही उचित है

क्यों की जाती है महाकाल की भस्म आरती

मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है। यह मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा दक्षिणमुखी शिवलिंग है, जो तंत्र-मंत्र की दृष्टि से भी खास महत्वपूर्ण माना गया है। भस्म की आरती सुबह – भस्म आरती एक रहस्यमयी व असामान्य अनुष्ठान है, जो विश्वभर में सिर्फ उज्जैन के महाकाल मंदिर में किया जाता है। महाकाल मंदिर में आयोजित होने वाले विभिन्न दैनिक अनुष्ठानों में दिन का पहला अनुष्ठान भस्म आरती होती है।

ऐसी मान्यताएं हैं कि भगवान शिव को जगाने व उनका श्रृंगार करने के लिए सुबह 4 बजे यह आरती की जाती है। भस्म आरती के दौरान महिलाओं का वहां रहना वर्जित है। पुराण-महाभारत में मिलता है वर्णन- पुराणों, महाभारत व कई रचनाओं में भी इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। माना जाता है कि इनके दर्शन मात्र से ही लोगों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है। उज्जैन में महाकाल को ही राजा माना जाता है, इसलिए महाकाल की इस नगरी में और कोई भी राजा कभी रात में यहां नहीं ठहरता है।

क्यों की जाती है भस्म आरती। शिवपुराण के अनुसार भस्म सृष्टि का सार है। एक दिन पूरी सृष्टि इसी राख के रूप में परिवर्तित होनी है। सृष्टि के सार भस्म को भगवान शिव सदैव धारण किए रहते हैं। इसका अर्थ है कि एक दिन यह संपूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन हो जाएगी।

कैसे होता है तैयार।

भस्म तैयार करने के लिए कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर के वृक्ष की लकडि़कों को एक साथ जलाया जाता है। इस दौरान उचित मंत्रोच्चार भी किए जाते हैं। इन चीजों को जलाने पर जो भस्म प्राप्त होती है, उसे कपड़े से छान लिया जाता है। इस प्रकार, तैयार की गई भस्म भगवान शिव को अर्पित की जाती है।

प्राचीन काल में महाकाल का श्रृंगार शमशान घाट से लाई गयी मुरदे की भस्मी से किया जाता था परंतु अब इसमें बदलाव क्र दिया गया है.

पापों से मिलेगी मुक्ति।

ऐसी मान्यताएं हैं कि शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाना चाहिए। जिस प्रकार भस्म से कई प्रकार की वस्तुएं शुद्ध व साफ की जाती हैं, उसी प्रकार भगवान शिव को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी। साथ ही, कई जन्मों के पापों से भी मुक्ति मिल जाएगी।

कच्चे धागे से बांधे शनिदेव से पक्का रिश्ता कटेगा शनि का प्रकोप

कच्चे धागे से शनिदेव के साथ पक्का रिश्ता बांध लीजिए. क्‍योंकि यही कच्चा धागा आपको कलयुग के देवता शनि का वरदान दिला सकता है. हिमाचल प्रदेश के महाकाल मंदिर में शनिदेव का ऐसा मंदिर है, जहां खंभों पर कच्चा धागा बांध दिया जाए तो न केलव शनि प्रकोप कट जाता है बल्कि विपरीत ग्रह स्थिति से भी मुक्ति मिल जाती है.
महाकाल मंदिर में गोल-गोल खंभों के इर्द गिर्द घूमती है भक्तों की दुनिया. इनमें ही वो भरोसा और चमत्कार दिखता है जिसका अनुभव करने के लिए भक्‍त न तो समय की परवाह करते हैं और न ही दूरी की. महाकाल मंदिर में लगे खंभे कोई मामूली खंभे नहीं हैं, ये मुराद पूरी करने वाले खंभे हैं. ये आस्था को परवान चढ़ाने वाले खंभे हैं, ये चमत्कार दिखाने वाले खंभे हैं. शनिदेव के मंदिर के ये 12 खंभे भक्तों को शनिदेव का आशीर्वाद दिलाते हैं और भक्तों के हर दुख का निवारण करते हैं.

हिमाचल प्रदेश के महाकाल गांव में बने शनिदेव के मंदिर में हर राशि का एक खंभा है. कहते हैं अगर भक्त अपनी राशि के खंभे पर कच्चा धागा बांधकर कामना मांगते हैं तो शनिदेव उन्हें कभी निराश नहीं करते. चाहे साढ़ेसाती हो या ढैय्या, अष्टम शनि का संकट हो या कंटक शनि के कांटे जीवन में चुभ रहे हों, भक्तों के जीवन का हर दुख यहां आकर सुख में बदल जाता है.

कहते हैं इसी मंदिर में आकर शनि ने महाकाल की आराधना कर उनसे शक्तिशाली होने का वरदान पाया था. यहीं पर शनिदेव की इच्छा पूरी हुई थी, इसलिए यहां शनिदेव भक्तों की हर इच्छा पूरी करते हैं.

‘काल उसका क्या करे, जो भक्त हो महाकाल का.

महादेव भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर संसार का एकमात्र दक्षिणमुखी शिवलिंग है, जो स्वयंभू होने के साथ साथ तांत्रिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है। कहते हैं महाकाल के समक्ष महामृत्युंजय का जप करने से द्वार पर आई मृत्यु उल्टे पांव लौट जाती है, रोगी स्वस्थ होकर दीर्घायु हो जाता है। महाकाल की आराधना से अकाल मृत्यु का योग नष्ट हो जाता है और मृत्युशय्या पर पड़ा व्यक्ति भी नया जीवन पाता है। मालवा में यह कहावत प्रसिद्ध है कि ‘अकाल मृत्यु वो मरे, जो काम करे चण्डाल का। काल उसका क्या करे, जो भक्त हो महाकाल का..!
शिव पुराण में बताया गया है कि भूषण नामक दैत्य के अत्याचार से जब उज्जयिनी वासी त्रस्त हो गए, तो उन्होंने अपनी रक्षा के लिए भगवान शिव की आराधना की। आराधना से प्रसन्न हो भगवान शिव ज्योति रूप में प्रकट हुए तथा दैत्य का संहार कर लोगों की रक्षा की।

श्राद्ध में नहीं करवानी चाहिए तेल मालिश, इन बातों का रखें ध्यान.

इन दिनों श्राद्ध पक्ष चल रहा है। श्राद्ध पक्ष में पितरों यानी पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान आदि किए जाते हैं। हमारे धर्म शास्त्रों में श्राद्ध पक्ष के लिए कई नियम भी बताए गए हैं। इन नियमों में कुछ कामों के लिए मनाही है, वहीं कुछ बातें जरूरी बताई गई हैं। ऐसा माना जाता है कि इन नियमों का पालन करने से पितर हमसे संतुष्ट होते हैं और शुभ फल प्रदान करते हैं। इसलिए पितरों को प्रसन्न रखने के लिए इन नियमों का पालन जरूर करना चाहिए। ये नियम इस प्रकार हैं-

1. श्राद्ध पक्ष में बॉडी मसाज या तेल की मालिश नहीं करवानी चाहिए। इन दिनों पान भी नहीं खाना चाहिए। श्राद्ध के दौरान क्षौर कर्म यानी बाल कटवाना, शेविंग करवाना या नाखून काटना आदि की भी मनाही है।

2. जो पुरुष श्राद्ध का दान देकर अथवा श्राद्ध में भोजन करके स्त्री के साथ समागम करता है, उसके पितर उस दिन से लेकर एक महीने तक उसी के वीर्य में निवास करते हैं। इसलिए भूलकर भी उस दिन स्त्री समागम नहीं करना चाहिए।
3.श्राद्ध पक्ष के दौरान किसी और का खाना नहीं खाना चाहिए। इन दिनों खाने में मसूर की दाल, चना, लहसुन, प्याज, काला जीरा, काले उड़द, काला नमक, राई, सरसों आदि वर्जित मानी गई है। अत: खाने में इनका प्रयोग ना करें तो बेहतर रहता है।
आखिरी श्राद्ध ३० सितंबर को होगा

4. श्राद्ध के दिनों में तांबे के बर्तनों का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए। श्राद्ध कर्म या पिण्डदान आदि कार्य करते समय कमल, मालती, जूही, चम्पा के पुष्प अर्पित करने से पितर प्रसन्न होते हैं।

5. श्राद्ध करते समय पितरों की तृप्ति के लिए नीचे लिखे मंत्र का जाप करते रहें। इस मंत्र का जाप करने से पितरों सहित सभी देवी-देवता भी आपसे प्रसन्न होंगे।
मंत्र- ऊं पितृभ्य स्वधायीभ्य स्वधा नम: पितामहेयभ्य: स्वधायीभ्य स्वधा नम: प्रपितामहेयभ्य स्वधायीभ्य स्वधा नम:, अक्षंतपितरोमी पृपंतपितर: पितर: शुनदद्धवम्